पिता के संदर्भ एक चिट्ठी है
टेबल पर रखी
दोनों ओर लिखा है
एक-एक ख़त
एक उनने
एक मैंने लिखा
इन चिट्ठियों को कोई नहीं
पढ़ता-देखता अब
पंखे की हवा में फड़फड़ाता है ख़त
पेपरवेट से दबा
पिता के संदर्भ में बातें
पिता के मन में
गूँजती रहती हैं कमरे में
पिता का मन कमरे में
क्यों गूँजता है मगर
मेरे संदर्भ में कराहते हुए!








