सब कुछ अगर झूठ हो तो भी बचा रहता है थोड़ा-सा सच

आदित्य शुक्लआदित्य शुक्ल27 Sept 1991

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सब कुछ अगर झूठ हो तो भी बचा रहता है थोड़ा-सा सच

सभी अगर भूल जाएँ तो भी कभी-कभी करता है कोई याद

कहीं कोई जगह न हो तो भी बची रहती है थोड़ी जगह

कुछ भी समझ न आए तो भी बनते हैं भाषाबंध

पुकारते हैं जो आपको बिना बताए

कहाँ चली जाती होंगी उनकी ध्वनियाँ?

यहाँ नदी तट पर बहुत सी लावारिस नाव हैं जिनसे रिसता है पानी

जिन्हें लेकर कोई नहीं उतरेगा नदी में

आँखे बंद करके कोई सपना भी देख सकता है और सुबक भी सकता है।

कोई सुबह जलाता है जब रसोई में चूल्हा तो ईंधन में झोंकता है अपने सपने

सपनों की आँच पर पकी रोटी फिर थोड़ी तो मीठी होगी।

आदित्य शुक्ल
About the poet

आदित्य शुक्ल

आदित्य शुक्ल 1991 देवरिया, उत्तर प्रदेश नई पीढ़ी के कवि, लेखक और अनुवादक। Aditya Shukla 1991 Deoria, Uttar Pradesh A new generation of poets, writers and translators.

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