ढिबरी की लौ

हरि मृदुलहरि मृदुल

1 min read · 12.4K reads

अब घर के काफ़ी नज़दीक पहुँच चुका हूँ

हालाँकि घंटा भर लगेगा अभी

घर तक पहुँचने में

दो मील का कठिन उकाव पार हो चुका है

अब ज़्यादा चढ़ाई-उतराई नहीं

मैं एक ढुँग में बैठा हूँ

बैठने वाले एक ख़ास ढुँग में

जो कि वास्तव में एक छोटी चट्टान है

फुर फुर हवा चल पड़ी है

तो पसीने से भीगी क़मीज़ भी

सुख दे रही है

यह अमावस की रात है

इस काली रात में मेरा घर चमक रहा है

एक ढिबरी की लौ से

बीच-बीच में कभी थरथरा रही है लौ

तो उसे आँचल की ओट से बचा रही है मेरी सुवा...

जैसे मेरी आँखें दूरबीन बन चुकी हैं

दुनिया की सबसे अत्याधुनिक दूरबीन

घर भीतर की हर हलचल मेरी आँखों के

सामने है

मेरी सुवा मेरे सामने है

चूडियाँ खनक रही हैं बार-बार

फिर-फिर पाजेब बज रही हैं

गुलाबी मुखड़ी लजा रही है

माँ कुछ पूछ रही है

पिता कुछ कह रहे हैं

सुवा गुनगुना रही है

आँसू पोंछती जा रही है

बाहर जा रही है

भीतर आ रही है

फिर देहरी में बैठ जा रही है

ढिबरी की लौ और भी तेज़ होती जा रही है...

अब घर की ओर मुँह कर मैंने बीसियों बार

टॉर्च जलाई-बुझाई है

उधर सुवा ने भी जवाब में यही किया है

पिछली छुट्टी में गाँव आते वक़्त

बस ऐसे ही ईजाद हुआ था

यह अनोखा सिग्नल

घंटे भर बाद घर पहुँचने का सिग्नल!

टॉर्च फिर जली-बुझी है

फिर-फिर जली-बुझी है

शायद माँ ने भी साथ दिया है

पिता ने भी

अब मेरे पाँव गाँव की राह

अलग ही चाल में बढ़ चले हैं

भूल चुके एक सीध में चलने वाली लेफ़्ट-राइट-लेफ़्ट...

साल भर बाद दो महीने की छुट्टी पर घर आ रहा

मैं तीन कुमाऊँ रेज़ीमेंट का 7997280 नंबर सिपाही।

हरि मृदुल
About the poet

हरि मृदुल

View profile & all 50 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like

उसने मिट्टी को छुआ भर था - प्रताप सोमवंशीपसोपेश में हूँकि कविता चिह्नों में होती है— प्रताप सोमवंशीदर्द औरों का हम - प्रताप सोमवंशीपसोपेश में हूँकि कविता चिह्नों में होती है— प्रताप सोमवंशीमुनव्वर राना के शेरअब जुदाई के सफ़र को मिरे आसान करोतुम मुझे ख़्वाब में आ कर न परेशान करो— मुनव्वर रानाये सर-बुलंद होते ही शाने से कट गयाये सर-बुलंद होते ही शाने से कट गयामैं मोहतरम हुआ तो ज़माने से कट गया— मुनव्वर रानाकुछ नहीं चाहने वाली लड़कीसोलह की यह लड़की दो-तीन साल पहले तकपेड़-पौधों पर रखती थी पाँव— ऐश्वर्य राजप्रतिज्ञाप्रतिज्ञाएँ बहा दो पानी में लड़कीप्रतिज्ञाएँ बहाओ पानी में;— बीरेंद्र चट्टोपाध्याय