अब घर के काफ़ी नज़दीक पहुँच चुका हूँ
हालाँकि घंटा भर लगेगा अभी
घर तक पहुँचने में
दो मील का कठिन उकाव पार हो चुका है
अब ज़्यादा चढ़ाई-उतराई नहीं
मैं एक ढुँग में बैठा हूँ
बैठने वाले एक ख़ास ढुँग में
जो कि वास्तव में एक छोटी चट्टान है
फुर फुर हवा चल पड़ी है
तो पसीने से भीगी क़मीज़ भी
सुख दे रही है
यह अमावस की रात है
इस काली रात में मेरा घर चमक रहा है
एक ढिबरी की लौ से
बीच-बीच में कभी थरथरा रही है लौ
तो उसे आँचल की ओट से बचा रही है मेरी सुवा...
जैसे मेरी आँखें दूरबीन बन चुकी हैं
दुनिया की सबसे अत्याधुनिक दूरबीन
घर भीतर की हर हलचल मेरी आँखों के
सामने है
मेरी सुवा मेरे सामने है
चूडियाँ खनक रही हैं बार-बार
फिर-फिर पाजेब बज रही हैं
गुलाबी मुखड़ी लजा रही है
माँ कुछ पूछ रही है
पिता कुछ कह रहे हैं
सुवा गुनगुना रही है
आँसू पोंछती जा रही है
बाहर जा रही है
भीतर आ रही है
फिर देहरी में बैठ जा रही है
ढिबरी की लौ और भी तेज़ होती जा रही है...
अब घर की ओर मुँह कर मैंने बीसियों बार
टॉर्च जलाई-बुझाई है
उधर सुवा ने भी जवाब में यही किया है
पिछली छुट्टी में गाँव आते वक़्त
बस ऐसे ही ईजाद हुआ था
यह अनोखा सिग्नल
घंटे भर बाद घर पहुँचने का सिग्नल!
टॉर्च फिर जली-बुझी है
फिर-फिर जली-बुझी है
शायद माँ ने भी साथ दिया है
पिता ने भी
अब मेरे पाँव गाँव की राह
अलग ही चाल में बढ़ चले हैं
भूल चुके एक सीध में चलने वाली लेफ़्ट-राइट-लेफ़्ट...
साल भर बाद दो महीने की छुट्टी पर घर आ रहा
मैं तीन कुमाऊँ रेज़ीमेंट का 7997280 नंबर सिपाही।








