पृथ्वी पर

आदित्य शुक्लआदित्य शुक्ल27 Sept 1991

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उन सभी बातों के शब्द याद आते हैं जो किसी ने कहे ही नहीं

उन सभी लोगों के स्पर्श होते हैं महसूस जो कहीं हैं ही नहीं

कभी न हुई घटनाएँ उपन्यास के पन्नों की तरह स्मृतियों में खुलने लगी हैं

जाने कौन-सी हवाएँ उन्हें फड़फड़ा देती हैं

जाने कौन थे वे लोग जो इस पुल से होकर गुज़रे

एक सपने में देखा कोई रो रहा था और नींद खुली तो आँखों के कोरों में ठहरे हुए थे कई बूँद आँसू

कितनी परछाइयाँ इधर भटकती रहती हैं

उनमें से एक कोई तुम्हारी होती

कितनी आवाज़ें आती हैं

लेकिन एक आवाज़ नहीं आती सुकून की कहीं से

हम जाने कहाँ जा रहे हैं

हमें जाने कौन बुला रहा है

चलते-चलते हम अवकाश में गिर जाते हैं

और फिर देर तक देर तक गिरते रहते हैं गिरते जाते हैं

गुरुत्वहीन अवकाश

समयरहित इतिहास

और दूर तक दूर तक प्रकाश नहीं

रंग नहीं

ध्वनि नहीं

होना नहीं

पृथ्वी पर बचा आख़िरी हरकारा एक ख़ाली पन्ने को घूरता है।

आदित्य शुक्ल
About the poet

आदित्य शुक्ल

आदित्य शुक्ल 1991 देवरिया, उत्तर प्रदेश नई पीढ़ी के कवि, लेखक और अनुवादक। Aditya Shukla 1991 Deoria, Uttar Pradesh A new generation of poets, writers and translators.

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