अधखुली आँखों से टपकती है नींद ,
बिस्तर रेशमी होता जाता है।
तुम्हें आधा देखते और आधा छूते हुए मैं पूछता हूँ :
देखो तो सुबह हो आई है क्या, यह झुटपुटा-सा क्यों है, सूरज लाल है क्या क्षितिज पर देखो तो?
मानसून की पहली बारिश है, हो रही। सड़कें भीग गई हैं। कोई दो प्रेमी इस मिट्टी के रास्ते से गुज़रे हैं
बारिश हो रही है।
आँखों से टपकती है नींद,
बिस्तर रेशमी होता जाता है।
तुम कहती हो :
चलो कहीं चले चलते हैं—
दूर।
क्या तुम मेरे साथ गाँव चलोगी—वहाँ हम खेतों में काम करेंगे और गन्ना और मक्का उगाएँगे।
गाँव के लोगों ने कामचोरी में आकर ऐसी खेती करनी बंद कर दी है या शायद वे उम्मीद करते-करते ऊब गए हैं।
अब कुछ और नहीं, ईश्वर ही उनका एकमात्र सहारा है।
वे अब मंदिरों और प्रार्थनाओं में अधिक मान्यताएँ रखने लगे हैं।
बजाय इसके कि वे खेती करते।
गाँव चलोगी क्या?
या अगर मन बदल जाए तो मैं तुम्हारे साथ गाँव को जाने के लिए बैठे ट्रक पर से अचानक उतरकर कहूँ
कि नहीं, नहीं। चलो पहाड़ों पर चलते हैं, जहाँ हमें कोई भी नहीं जानता। तो फिर भी तुम चलोगी क्या?
तुम मौन हो, स्वप्न में मौन हो। पर तुम्हारी आँखें खुली हैं—पूरी की पूरी। तुम्हारी आँखों में दृश्य चल रहा होगा। दृश्य हमें मौन कर देते हैं फिर तुम कहती हो :
हाँ, चलो न। चलो कहीं भी। कहीं से उतरकर, कहीं भी चले चलेंगे। मैं थोड़ा-बहुत जितना भी जीना चाहती हूँ, बस तुम्हारे साथ चाहती हूँ। अगर हम पहाड़ों पर चलें तो वहाँ एक स्कूल चलाएँगे। अब मुझे कभी-कभी बच्चों को पढ़ाने का मन करता है।
यह कहकर अकस्मात् तुम्हारी आँखों से नींद टपकती है और बिस्तर किसी विशाल समुद्र में तब्दील हो जाता है।
मानसून की पहली बारिश है अलस्सुबह, अख़बार बेचने वाला पुराने रेनकोट में आधा भीगते और चिल्लाते हुए कहीं से आ रहा है और कहीं को जा रहा है। अख़बारों में पता नहीं कैसी-कैसी ख़बरें हैं। कोई अच्छी ख़बर होती तो वह मेरे घर की बालकनी में भी अख़बार फेंक जाता या पिछले महीने का बक़ाया माँगने आ जाता, जब मैं या तुम अधखुली नींद में एक घंटे बाद आने को कह देते।
नींद ऐसी टपकती है कि सब कुछ रेशम हो जाता है, शहतूत के पौधे पर लगे फल मीठे हो जाते हैं और हम तोड़ते-बीनते-खाते-जाते हैं। नींद टपकती आँखों के सामने न जाने किस फूल के पौधे पर तितलियाँ मंडरा रही हैं... तितलियाँ ही हैं कि न जाने कुछ और... और स्वप्न में नींद का ऐसा ख़ुमार है कि तितलियाँ जान पड़ती हैं वे।








