बच्ची माँ के गले से झूलती कहती है,
‘माँ, तुम डरो मत।’
‘बाबू शोना तुम शांत रहो! बाहर
दरवाज़ा तोड़ रहा है बाघ!’
‘पिताजी बाघ भगाने का मंत्र जानते हैं
मंत्र जानता है दादा भी।’
‘बाबू शोना तुम शांत रहो! बाहर
दीवार में छेद कर रहा है साँप।’
‘पिताजी साँप भगाने का मंत्र जाते हैं
मंत्र जानता है दादा भी।’
‘चुप रहो! चुप रहो! बाहर आई है पुलिस!’
(हाथ की लाठी हाथ में ही रह जाती है, पाषाण हो जाते हैं पिता
पाषाण हो जाते हैं दादा भी!)
‘‘बाबू शोना शांत रहो तुम! शांत रहो!’—
बोलती-बोलती माँ
देखती है डर से पाषाण हो गई है बेटी, पलकें भी नहीं झपकती!’
घर-बाहर कहीं थोड़ी भी हवा नहीं चलती।








