जब मैं पर्वतों पर था
हरे पेड़, रंगहीन पत्थरों के बीच
मैंने कल्पना की एक निर्मल नदी की
नदी जो पहाड़ की चोटियों से उतर पत्थरों से लड़-टकरा
मेरे सामने से बह-निकल रही थी।
मैंने तब उसी नदी की कल्पना की
जिसमें मेरी अंधी आँखों के सामने श्रद्धालु लोग नहा रहे थे।
नदी जो तब वर्तमान थी—मेरी आँखों के सामने।
अस्ल में तब वह नदी मेरे भविष्य का हिस्सा थी
जिसमें मैं बह रहा था।
जब मैं पठारों से होकर गुज़रा
पठारों पर तब सफ़ेद बर्फ (!) की बर्फ़बारी हुई
यह बर्फ़बारी भविष्य का हिस्सा थी।
मैं समुद्र-तट की रेत पर लिख रहा था अपनी प्रेयसी का नाम
हिंसक लहरें जिसे मिटा-मिटा देती थीं
मुझे फिर-फिर लिखने को विवश कर
इस वर्तमान में बादलों के बीच होकर गुज़रा एक जहाज़
अतीत के फ़्लैशबैक की मानिंद।
जहाज़ के नीचे समुद्र में तमाम समुद्री जहाज़
सामानांतर लकीरें बनाते जा रहे होते थे कहीं...
तब मैं अपने उस तमाम वर्तमान में
अतीत की तरह घटित हुआ
जिसे भविष्य मान लिया गया...








