बचपन में
किसी ने जूते की नोक से
दर्द चुभो दिया था
उस टीस में
मैं अब तक
रोज़ सिंका हूँ
इतना पका हूँ
कि सोच की लचक ने
भोथर खाल पहन लिया है
आँखें बंद करता हूँ
तो जूतों की वही खट-खट
कानों से धड़कन की
धक-धक को जोड़ देती है
उस खट-खट में आवाज़ों तले
अपनी माँ को
घंटों लड़ते देखा था
जाति से जूतों का संबंध
और जूतों की संख्या से
ऐसा प्रतीत होता है
हज़ारों घोड़े
धान के बिचरें रौंदते जा रहे हों
कीचड़ के छींटे
पानी के छींटे
और ख़ून के भी
खाट के पीछे छिपे मेरे चेहरे तक
उड़कर आ जाते
कुचलने की पुरज़ोर कोशिश के बीच
अपनी दुम और फ़न
दोनो ही बचा लिए हैं मैंने
हिस्से में मेरे
रह गया एक अमिट चोट का धब्बा
और टक-टक की आवाज़








