जाति

यतीश कुमारयतीश कुमार21 Aug 1976

1 min read · 12.4K reads

बचपन में

किसी ने जूते की नोक से

दर्द चुभो दिया था

उस टीस में

मैं अब तक

रोज़ सिंका हूँ

इतना पका हूँ

कि सोच की लचक ने

भोथर खाल पहन लिया है

आँखें बंद करता हूँ

तो जूतों की वही खट-खट

कानों से धड़कन की

धक-धक को जोड़ देती है

उस खट-खट में आवाज़ों तले

अपनी माँ को

घंटों लड़ते देखा था

जाति से जूतों का संबंध

और जूतों की संख्या से

ऐसा प्रतीत होता है

हज़ारों घोड़े

धान के बिचरें रौंदते जा रहे हों

कीचड़ के छींटे

पानी के छींटे

और ख़ून के भी

खाट के पीछे छिपे मेरे चेहरे तक

उड़कर आ जाते

कुचलने की पुरज़ोर कोशिश के बीच

अपनी दुम और फ़न

दोनो ही बचा लिए हैं मैंने

हिस्से में मेरे

रह गया एक अमिट चोट का धब्बा

और टक-टक की आवाज़

यतीश कुमार
About the poet

यतीश कुमार

सुपरिचित कवि-लेखक। कविताओं की दो पुस्तकें 'अन्तस की खुरचन' और 'आविर्भाव' शीर्षक से प्रकाशित । मूल नाम : यतीश कुमार जन्म : 21/08/1976 | मुंगेर, बिहार 21 अगस्त 1976 को मुंगेर (बिहार) में जन्मे यतीश कुमार ने कविता और कहानी के साथ-साथ चर्चित उपन्यासों, कहानियों व…

View profile & all 36 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like