जीवन पत्तियों की तरह है
आज हरी तो कल सूखी
वसंत में खिलखिलाई
पतझड़ में बहुत याद आई
इसीलिए
मेरी बच्ची!
लहलहाना ज़रूर
जब आँधियाँ चलें
तुम जड़ मत हो जाना
जड़ बन जाना
रहना ऋतुओं के असर से बेअसर
वसंत और बरखा को अपने भीतर बचाए
दुनिया को जीवंत और नम बनाने के लिए
मेरी बच्ची!
ख़ूब खेलना
खेलने के लिए खेलना
जीतने के लिए मत खेलना
पत्थर तो डूब जाते हैं
तुम तिनका बन तूफ़ानों में भी तैरना
बनना डूबते का सहारा
मेरी बच्ची!
चमकना तुम इतना
कि अँधेरे में भी कोई आँख
स्याह न रहने पाए
पसर जाना रौशनी की तरह
कि हाथों को थामने के लिए हाथ मिल जाए
जीवन-पथ पर बहुतायत शून्य
शक्ल बदल-बदलकर मिलेंगे
तुम सीखना...
छिद्र शून्य से बचना
और विच्छेद शून्य को गले लगाना
मेरी बच्ची!
तुम प्रकृति हो
देती हो मुझे बार-बार जीवन
करती हो मेरा पुनर्नवा।








