कंक्रीट के जंगल में
कई झुटपुटे एकांत हैं
उन झरोखों से झाँकती हैं
झुर्रीदार आँखें
कबूतरों के अस्थायी घोंसलों में
कहीं गुम हो गई हैं
माँ की प्यारी सखियाँ
कभी-कभी खोजने लगती हैं
पापा के साथ आने वाली
दोस्तों के चेहरे में उनको
या कभी मेरे दोस्तों की माँओं में
खोजने लगती हैं पास-पड़ोस की
मुंहबोली चाची, मामी, काकी में
गुम हो गई अपनी सहेलियों को
जो थी नादानियों के दिनों की
उनकी सबसे अच्छी दोस्त
माँ टकटकी लगाए
झुटपुटों से राह तकती
झुर्रियों का दायरा बढ़ाती
अंतहीन प्रतीक्षा में है
स्मृतियाँ ख़ुद को बस दोहराती हैं
याद आती है
बस नहीं आती हैं तो माँ की सखियाँ








