रात हमेशा से
दो तारीख़ों का मसला है
जो दिन के उजाले में कभी नहीं होते
अक्सर यह भी सोचता हूँ
कि सारे मसलात
कमबख़्त रातों के साथ ही क्यों होते हैं!
एक बातूनी लड़की
अचानक गुपचुप बैठ जाए
तो मसला दिन में भी पैदा हो जाता है
आग कब की बुझ गई
राख देर तक सुलगती रही
मसला दरअस्ल एक चुनाव है
तिल-तिल जलने
और एकबारगी जल जाने के बीच
जबकि मन है
कि निरंतर जलता जा रहा है
पूरी तरह से बुझ जाने के सच को
ख़ारिज करता हुआ।








