आखिरी कलाम 6

Malik Muhammad JayasiMalik Muhammad Jayasi1 Jan 1477

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सुनि फरमान हरष जिउ बाढे । एक पाँव से भए उठि ढाढे ॥
झारि उमत लागी तब तारी । जेता सिरजा पुरुष औ नारी ॥
लाग सबन्ह सहुँ दरसन होई । ओहि बिनु देखे रहा न कोई ॥
एक चमकार होइ उजियारा । छपै बीजु तेहि के चमकारा ॥
चाँद सुरुज छपिहैं बहु जोती । रतन पदारथ मानिक मोती ॥
सो मनि दिपें जो कीन्हि थिराई । छपा सो रंग गात पर आई ॥
ओहु रूप निरमल होइ जाई । और रूप ओहि रूप समाई ॥
ना अस कबहूँ देखा, ना केहू ओहि भाँति ।
दरसन देखि मुहम्मद मोहि परे बहु भाँति ॥ 51॥

दुइ दिन लहि कोउ सुधि न सँभारे । बिनु सुधि रहे, न नैन उघारे ॥
तिसरे दिन जिबरैल जौ आए । सब मदमाते आनि जगाए ॥
जे हिय भेदि सुदरसन राते । परे परे लोटैं जस माते ॥
सब अस्तुति कै करै बिसेखा । ऐस रूप हम कतहुँ न देखा ॥
अब सब गएउ जलम-दुख धोई । जो चाहिय हठि पावा सोई ॥
अब निहचिंत जीउ बिधि कीन्हा । जौ पिय आपन दरसन दीन्हा ॥
मन कै जेति आस सब पूजी । रही न कोई आस गति दूजी ॥
मरन, गँजन औ परिहँस, दुख, दलिद्र सब भाग ।
सब सुख देखि मुहम्मद, रहस कूद जिउ लाग ॥52॥

जिबराइल कहँ आयसु होइहि । अछरिन्ह आइ आगे पय जोइहिं ॥
उमत रसूल केर बहिराउब । कै असवार बिहिस्त पहुँचाउब ॥
सात बिहिस्त बिधिनै औतारा । औ आठईं शदाद सँवारा ॥
सो सब देबउमत कहँ बाँटी । एक बराबर सब कहँ आँटी ॥
एक एक कहँ दीन्ह निवासू । जगत-लोक विरसैं कबिलासू ॥
चालिस चालिस हूरैं सोई । औ सँग लागि बियाही जोई ॥
ओ सेवा कहँ अछरिन्ह केरी । एक एक जनि कहँ सौ-सौ चेरी ॥
ऐसे जतन बियाहैं जस साजै बरियात ।
दूलह जतन मुहम्मद बिहिस्त चले बिहँसात ॥53॥

जिबराइल इतात कहँ धाए । चोल आनि उम्मत पहिराए ॥
पहिरहु दगल सुरँग-रँग राते । करहु सोहाग जनहु मद-माते ॥
ताज कुलह सिर मुहम्मद सोहै । चंद बदन औ कोकब मोहै ॥
न्हाइ खोरि अस बनी बराता । नबी तँबोल खात मुख राता ॥
तुम्हरे रुचे उमत सब आनब । औ सँवारि बहु भाँति बखानब ॥
खडे गिरत मद-माते ऐहैं । चढि कै घोडन कहँ कुदरैहैं ॥
जिन भरि जलम बहुत हिय जारा । बैठि पाँव देइ जमै ते पारा ॥
जैसे नबी सँवारे, तैसे बने पुनि साज ।
दूलह जतन मुहम्मद बिहिस्ति करैं सुख राज ॥54॥

तानब छत्र मुहम्मद माथे । औ पहिरैं फूलन्ह बिनु गाँथे ॥
दूलह जतन होब असवारा । लिए बरात जैहैं संसारा ॥
रचि रचि अछरिन्ह कीन्ह सिंगारा । बास सुबास उठै महकारा ॥
आज रसूल बियाहन ऐहैं । सब दुलहिन दूलह सहुँ नैहैं ॥
आरति करि सब आगे ऐहैं । नंद सरोदन सब मिलि गैहैं ॥
मँदिरन्ह होइहि सेज बिछावन । आजु सबहि कहँ मिलिहैं रावन ॥
बाजन बाजै बिहिस्त-दुवारा । भीतर गीत उठै झनकारा ॥
बनि बनि बैठीं अछरी , बैठि जोहैं कबिलास ।
बेगहि आउ मुहम्मद, पूजै मन कै आस ॥55॥

जिबरईल पहिले से जैहैं । जाइ रसूल बिहिस्त नियरैहैं ॥
खुलिहैं आठौं पँवरि दुवारा । औ पैठे लागे असवारा ॥
सकल लोग जब भीतर जैहैं पाछे होइ रसूल सिधैहैं ॥
मिलि हूरैं नेवछावरि करिहैं । सबके मुखन्ह फूल अस झरिहैं ॥
रहसि रहसि तिन करब किरीडा । अमर कुंकुमा भरा सरीरा ॥
बहुत भाँति कर नंद सरोदू । बास सुबास उठै परमोदू ॥
अगर, कपूर, बेना कस्तूरी । मँदिर सुबास रहब भरपूरी ॥
सोवन आजु जो चाहै, साजन मरदन होइ ।
देहिं सोहाग मुहम्मद, सुख बिरसै सब कोइ ॥56॥

पैठि बिहिस्त जौ नौनिधि पैहैं ।अपने अपने मँदिर सिधैहैं ॥
एक एक मंदिर सात दुवारा । अगर चँदन के लाग केवारा ॥
हरे हरे बहु खंड सँवारे । बहुत भाँति दइ आपु सँवारे ॥
सोने रूपै घालि उँचावा । निरमल कुहुँकुहुँ लाग गिलावा ॥
हीरा रतन पदारथ जरे । तेहि क जोति दीपक जस बरै ॥
नदी दूध अतरन कै बहहीं । मानिक मोति परे भुइँ रहहीं ॥
ऊपर गा अब छाहँ सोहाई । एक एक खंड चहा दुनियाई ॥
तात न जूड न कुनकुन, दिवस राति नहि दुक्ख ।
नींद न भूख मुहम्मद, सब बिरसैं अति सुक्ख ॥57॥

देखत अछरिन केरि निकाई । रूप तें मोहि रहत मुरछाई ॥
लाल करत मुख जोहब पासा । कीन्ह चहैं किछु भोग-बिलासा ॥
हैं आगे बिनवैं सब रानी । और कहैं सब चेरिन्ह आनी ॥
ए सब आवैं मोरे निवासा । तुम आगे लेइ आउ कबिलासा ॥
जो अस रूप पाट-परधानी । औ सबहिन्ह चेरिन्ह कै रानी ॥
बदन जोति मनि माथे भागू । औ बिधि आगर दीन्ह सोहागू ॥
साहस करै सिंगार सँवारी । रूप सुरूप पदमिनी नारी ॥
पाट बैठि नित जोहैं, बिरहन्ह जारैं माँस ।
दीन दयाल, मुहम्मद ! मानहु भोग-विलास ॥58॥

सुनहिं सुरूप अबहिं बहु भाँती । इनहिं चाहि जो हैं रुपवाँती ॥
सातौं पवँरि नघत तिन्ह पेखब । सातइँ आए सो कौकुत देखब ॥
चले जाब आगे तेहि आसा । जाइ परब भीतर कबिलासा ॥
तखत बैठि सब देखब रानी । जे सब चाहि पाट-परधानी ॥
दसन-जोति उट्ठ चमकारा । सकल बिहिस्त होइ उजियारा ॥
बारहबानी कर जो सोना । तेहि तें चाहि रूप अति लोना ॥
निरमल बदन चंद कै जोती । सब क सरीर दिपैं जस मोती ॥
बास सुबास छुवै जेहि बेधि भँवर कहँ जात ।
बर सो देखि मुहम्मद हिरदै महँ न समात ॥59॥

पैग पै जस जस नियराउब । अधिक सवाद मिलै कर पाउब ॥
नैन समाइ रहै चुप लागे । सब कहँ आइ लेहिं होइ आगे ॥
बिसरहु दूलह जोबन-बारी । पाएउ दुलहिन राजकुमारी ॥
एहि महँ सो कर गहि लेइ जैहैं । आधे तखत पै लै बैठैहैं ॥
सब अछूत तुम कहँ भरि राखे । महै सवाद होइ जौ चाखै ॥
नित पिरीत, नित नव नव नेहु । नित इठि चौगुन होइ सनेहू ॥
नित्तइ नित्त जो बारि बियाहै । बीसौ बीस अधिक ओहिं चाहै ॥
तहाँ त मीचु, न नींद, दुख, रह न देह महँ रोग ।
सदा अनँद `मुहम्मद', सब सुख मानैं भोग ॥60॥

Malik Muhammad Jayasi
About the poet

Malik Muhammad Jayasi

Malik Muhammad Jayasi (1477– 1542) was an Indian Sufi poet and pir. He wrote in the Awadhi language, and in the Persian Nastaʿlīq script. His best known work is the epic poem Padmavat (1540). Much of the information about Jayasi comes from legends, and his da…

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