आखिरी कलाम 4

Malik Muhammad JayasiMalik Muhammad Jayasi1 Jan 1477

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सवा लाख पैगंबर जेते । अपने अपने पाएँ तेते ॥
एक रसूल न बैठहिं छाहाँ । सबही धूप लेहिं सिर माहाँ ॥
घामै दुखी उमत जेहि केरी । सो का मानै सुख अवसेरी ?॥
दुखी उमत तौ पुनि मैं दुखी । तेहि सुख होइतौ पुनि मैं सुखी ॥
पुनि करता कै आयसु होई । उमत हँकारु लेखा मोहिं देई ॥
कहब रसूल कि आयसु पावौं । पहिले सब धरमी लै आवौं ॥
होइ उतर `तिन्ह हौं ना चाहौं । पापी घालि नरक महँ बाहौं ॥
पाप पुन्नि कै तखरी होइ चाहत है पोच ।
अस मन जानि मुहम्मद हिरदै मानेउ सोच ॥31॥

पुनि जैहैं आदम के पासा । `पिता! तुम्हारि बहुत मोहिं आसा ॥
`उमत मोरि गाढे है परी । भा न दान, लेखा का धरी ? ॥
`दुखिया पूत होत जो अहै । सब दुख पै बापै सौं कहै ॥
बाप बाप कै जो कछु खाँगै । तुमहिं छाँडि कासौं पुनि माँगै ?॥
`तुम जठेर पुनि सबहिन्ह केरा । अहै सतति ,मुख तुम्हरै हेरा ॥
`जेठ जठेर जो करिहैं मिनती । ठाकुर तबहीं सुनिहैं मिनती ॥
`जाइ देउ सों बिनवौ रोई । मुख दयाल दाहिन तोहि होई ॥
`कहहु जाइ जस देखेउ, जेहि होवै उदघाट ।
`बहु दुख दुखी मुहम्मद, बिधि ! संकट तेहि काट' ॥32॥

`सुनहु पूत! आपन दुख कहऊँ । हौं अपने दुख बाउर रहऊँ ॥
`होइ बैकुंठ जो आयसु ठेलेउँ । दूत के कहे मुख गोहूँ मेलेउ ॥
`दुखिया पेट लागि सँग धावा । काढि बिहिस्त से मैल ओढावा ॥
`परल जाइ मंडल संसारा । नैन न सूझे, निसि -अधियारा ॥
`सकल जगत मैं फिरि फिरि रोवा । जीउ अजान बाँधि कै खोवा ॥
`भएँ उजियार पिरथिवीं जइहौं । औ गोसाइँ कै अस्तुति कहिहौं ॥
`लौटि मिलै जौ हौवा आई । तौ जिउ कहँ धीरझ होइ जाई ॥
`तेहि हुँत लाजि उठै जिउ, मुहँ न सकौं दरसाइ ।
`सो मुह लेइ, मुहम्मद ! बात कहौं का जाइ ?॥33॥

पुनि जैहैं मूसा क दोहाई । ऐ बंधू ! मोहिं उपकरू आई ॥
`तुम कहँ बिधिना आयसु दीन्हा । तुम नेरे होइ बातैं कीन्हा ॥
`उम्मत मोरि बहुत दुख देखा । भा न दान, माँगत है लेखा ॥
`अब जौ भाइ मोर तुम अहौ । एक बात मोहिं कारन कहौ ॥
`तुम अस ठटै बात का कोई । सोई कहौं बात जेहि होई ॥
`गाढे मीत ! कहौं का काहू ? । कहहु जाइ जेहि होइ निबाहू ॥
`तुम सँवारि कै जानहु बाता । मकु सुनि माया करै बिधाता ॥
मिनती करहु मोर हुँत सीस नाइ, कर जोरि,।
हा हा करै मुहम्मद `उमत दुखी है मोरि ॥34॥

सुनहु रसूल बात का कहौं । हौं अपने दुख बाउर रहौं ॥
कै कै देखेउँ बहुत ढिठाई । मुँह गरुवाना खात मिठाई ॥
पहिले मो कहँ आयसु दीन्हा । फरऊँ से मैं झगरा कीन्हा ॥
`रोधि नील क डारेसि झुरा । फुर भा झूठ, झूठ भा फुरा ॥
`पुनि देखै बैकुंठ पठाएउ । एकौ दिसि कर पंथ न पाएउँ ॥
पुनि जो मो कहँ दरसन भएऊ । कोह तूर रावट होइ गएऊ ॥
`भाँति अनेक मैं फिर फिर जापा । हर दावँन कै लीन्हेसि झाँपा ॥
निरखि नैन मैं देखौं, कतहुँ परै नहिं सूझि ।
`रहौ लजाइ, मुहम्मद! बात कहौं का बूझि'? ॥35॥

दौरि दौरि सबही पहँ जैहैं । उतर देइ सब फिरि बहरैहैं ॥
ईसा कहिन कि कस ना कहत्यों । जौ किछु कहे क उत्तर पवत्यों ॥
मैं मुए मानुस बहुत जियावा । औ बहुतै जिउ-दान दियावा ॥
इब्राहिम कह, कस ना कहत्यों । बात कहे बिन मैं ना रहत्यों ॥
मोसौं खेलु बंधु जो खेला । सर रचि बाँधि अगिन महँ मेला ॥
तहाँ अगिन हुँत भइ फुलवारी । अपडर डरौं, न परहिं सँभारी ॥
नूह कहिन, जप परलै आवा । सब जग बूड, रहेउँ चढि नावा ॥
काह कहै काहू से, सबै ओढाउब भार ॥
जस कै बैन मुहम्मद, करू आपन निस्तार ॥36॥

सबै भार अस ठेलि ओढाउब । फिर फिर कहब, उतर ना पाउब ॥
पुनि रसूल जैहै दरबारा । पैग मारि भुइँ करब पुकारा ॥
तै सब जानसि एक गोसाईं । कोइ न आव उमत के ताई ॥
जेहि सौ कहौं सो चुप होइ रहै । उमत लाइ केहु बात न कहै ॥
मोहिं अस तहीं लाग करतारा । तोहिं होइ भल सोइ निस्तारा ॥
जो दुख चहसि उमत कहँ दीन्हा । सो सब मैं अपने सिर लीन्हा ॥
लेखि जोखि जो आवै मरन गँजन दुख दाहु ।
सो सब सहै मुहम्मद, दुखी कर जनि काहु ॥37॥

पुन रिसाइ कै कहै गोसाईं । फातिम कहँ ढूँढहु दुनियाईं ॥
का मोसौं उन झगर पसारा । हसन हुसैन कहौ को मारा ॥
ढूँढे जगत कतहुँ ना पैहैं । फिरि कै जाइ मारि गोहरैहैं ॥
ढूँढि जगत दिनिया सब आएउँ । फातिम-खोज कतहुँ ना पाएउँ ॥
`आयसु होइ, अहैं पुनि कहाँ' । उठा नाद हैं धरती महाँ ॥
`मूँदै नैन सकल संसारा । बीबी उठैं, करै निस्तारा ॥
जो कोई देखै नैन उघारी । तेहि कहँ छार करौं धरि जारी' ॥
आयसु होइहि देउ कर , नैन रहै सब झाँपि ॥
एक ओर डरैं मुहम्मद, उमत मरै डरि काँपि ॥38 ॥

उट्ठिन वीवी तब रिस किहें । हसन-हुसेन दुवौ सँग लीहें ॥
`तैं करता हरता सब जानसि । झूँठै फुरै नीक पहिचानसि ॥
`हसन हुसेन दुवौ मोर वारे । दुनहु यजीद कौन गुन मारे ? ॥
`पहिले मोर नियाव निबारू । तेहि पाछे जेतना संसारू ॥
`समुझें जीउ आगि महँ दहऊँ । देहु दादि तौ चुप कै रहऊँ ॥
`नाहि त देउँ सराप रिसाई । मारौं आहि अर्श जरि जाई ॥
`बहु संताप उठै निज, कैसहु समुझि न जाइ ।
`बरजहु मोह मुहम्मद, अधिक उठै दुख-दाइ' ॥39॥

पुनि रसूल कहँ आयसु होई । फातिम कहँ समुझावहु सोई ॥
`मारै आहि अर्श जरि जाई । तेहि पाछे आपुहि पछिताई ॥
` जो नहिं बात क करै बिषादू । जानौ मोहिं दीन्ह परसादू ॥
`जो बीबी छाँडहिं यह दोखू । तौ मैं करौं उमत कै मोखू ॥
नाहिं न घालि नरक महँ जारौं । लौटि जियाइ मुए पर मारौं ॥
`अग्नि-खंभ देखहु जस आगे । हिरकत छार होइ तेहि लागे ॥
`चहुँ दिसि फेरि सरग लै लावौं । मँगरन्ह मारौं, लोह चटावौं ॥
तेहि पाछे धरि मारौं घालि नरक के काँठ ।
बीबी कहँ समुझावहु, जौ रे उमत कै चाँट ॥40॥

Malik Muhammad Jayasi
About the poet

Malik Muhammad Jayasi

Malik Muhammad Jayasi (1477– 1542) was an Indian Sufi poet and pir. He wrote in the Awadhi language, and in the Persian Nastaʿlīq script. His best known work is the epic poem Padmavat (1540). Much of the information about Jayasi comes from legends, and his da…

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