आखरी कलाम 1

Malik Muhammad JayasiMalik Muhammad Jayasi1 Jan 1477

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पहिले नावँ दैउ कर लीन्हा । जेइ जिउ दीन्ह, बोल मुख कीन्हा ॥
दीन्हेसि सिर जो सँवारै पागा । दीन्हेसि कया जो पहिरै बागा ॥
दीन्हेसि नयन-जोति, उजियारा । दीन्हेसि देखै कहँ संसारा ॥
दीन्हेसि स्रवन बात जेहि सुनै । दीन्हेसि बुद्धि, ज्ञान बहु गुनै ॥
दीन्हेसि नासिक लीजै बासा । दीन्हेसि सुमन सुगंध-बिरासा ॥
दीन्हेसि जीभ बैन-रस भाखै । दीन्हेसि भुगुति, साध सब राखै ॥
दीन्हेसि दसन सुरंग कपोला । दीन्हेसि अधर जे रचै तँबोला ॥
दीन्हेसि बदन सुरूप रँग, दीन्हेसि माथे भाग ।
देखि दयाल, `मुहमद' सीस नाइ पद लाग ॥1॥

दीन्हेसि कंठ बोल जेहि माहाँ । दीन्हेसि भुजादंड, बल बाहाँ ॥
दीन्हेसि हिया भोग जेहि जमा । दीन्हेसि पाँच भूत, आतमा ॥
दीन्हेसि बदन सीत औ घामू । दीन्हेसि सुक्ख-नींद बिसरामू ॥
दीन्हेसि हाथ चाह जस कीजै । दीन्हेसि कर-पल्लव गहि लीजै ॥
दीन्हेसि रहस कूद बहुतेरा । दीन्हेसि हरष हिया बहु मेरा ॥
दीन्हेसि बैठक आसन मारै । दीन्हेसि बूत जो उठें सँभारै ॥
दीन्हेसि सबै सँपूरन काया । दीन्हेसि दोइ चलै कहँ पाया ॥
दीन्हेसि नौ नौ फाटका, दीन्हेसि दसवँ दुवार ।
सो अस दानि `मुहमद', तिन्ह कै हौं बलिहार ॥2॥

मरम नैन कर अँधरै बूझा । तेहि बिसरे संसार न सूझा ॥
मरम स्रवन कर बहिरै जाना । जो न सुनै, किछु दीजै साना ॥
मरम जीभ कर गूँगै पावा । साध मरै, पै निकर न नावाँ ॥
मरम बाहँ कै लूलै चीन्हा । जेहि बिधि हाथन्ह पाँगुर कीन्हा ॥
मरम कया कै कुस्टी भेंटा । नित चिरकुट जो रहै लपेटा ॥
मरम बैठ उठ तेहि पै गुना । जो रे मिरिग कस्तूरी पहाँ ॥?
मरम पावँ कै तेहि पै दीठा । होइ अपाय भुइँ चलै बईठा ॥
अति सुख दीन्ह बिधातै, औ सब सेवक ताहि ।
आपन मरम `मुहमद' अबहूँ समुझ, कि नाहि ॥3॥

भा औतार मोर नौ सदी । तीस बरीस ऊपर कबि बदी ॥
आवत उधत-चार बिधि ठाना । भा भूकंप जगत अकुलाना ॥
धरती दीन्ह चक्र-बिधि लाईं । फिरै अकास रहँट कै नाईं ॥
गिरि पहार मेदिनि तस हाला । जस चाला चलनी भरि चाला ॥
मिरित-लोक ज्यों रचा हिंडोला । सरग पताल पवन-खट डोला ॥
गिरि पहार परबत ढहि गए । सात समुद्र कीच मिलि भए ॥
धरती फाटि, छात भहरानी । पुनि भइ मया जौ सिष्टि समानी ॥
जो अस खंभन्ह पाइ कै, सहस जीभ गहिराइँ ।
सो अस कीन्ह `मुहमद', तोहि अस बपुरे काइँ ॥4॥

सूरुज (अस) सेवक ताकर अहै । आठौ पहर फिरत जो रहै ॥
आयसु लिए रात दिन धावै । सरग पताल दुवौ फिरि आवै ॥
दगधि आगि महँ होइ अँगारा । तेहि कै आँच धिकै संसारा ॥
सो अस बपुरै गहनै लीन्हा । औ धरि बाँधि चँडालै दीन्हा ॥
गा अलोप होइ, भा अँधियारा । दीखै दिनहि सरग महँ तारा ॥
उवतै झप्पि लीन्ह, घुप चाँपै । लाग सरब जिउ थर थर काँपै ॥
जिउ कहँ परे ज्ञान सब झूठै । तब होइ मोख गहन जौ छूटै ॥
ताकहँ एता तरासै जो सेवक अस नित ।
अबहुँ न डरसि `मुहमद', काह रहसि निहचिंत ॥5॥

ताकै अस्तुति कीन्हि न जाई । कोने जीभ मैं करौं बढाई ?॥
जगत पताल जो सैते कोइ । लेखनी बिरिख, समुद मसि होई॥
लागै लिखै सिष्टि मिलि जाई । समुद घटै, पै लिखि न सिराई ॥
साँचा सोइ और सब झूठे । ठावँ न कतहुँ ओहि कै रूठे ॥
आयसु इबलीस हु जौ टारा । नारद होइ नरक महँ पारा ॥
सौ दुइ कटक, कहउ लखि घोरा । फरऊँ रोधि नील महँ बोरा ॥
जौ शदाद बैकुंठ सँवारा । पैठत पौरि बीच गहि मारा ॥
जो ठाकुर अस दारुन, सेवक तइँ निरदोख ।
माया करै `मुहम्मद', तौ पै होइहि मोख ॥6॥

रतन एक बिधनै अवतारा । नावँ `मुम्मद' जग-उजियारा ॥
चारि मीत चहुँदिसि गजमोती । माँझ दिपै मनु मानिक-जोती ॥
जेहि हित सिरजा सात समुंदा । सातहु दीप भए एक बुंदा ॥
तर पर चौदह भुवन उसारे । बिच बिच खंड-बिखंड सँवारे ॥
धरती औ गिरि मेरु पहारा । सरग चाँद सूरज औ तारा ॥
सहस अठारह दुनिया सिरैं । आवत जात जातरा करैं ॥
जेइ नहिं लीन्ह जनम महँ नाऊँ । तेहहि कहँ कीन्ह नरक महँ ठाऊँ ॥
सो अस देऊ न राखा, जेहि कारन सब कीन्ह ।
दहुँ तुम काह `मुहम्मद' एहि पृथिवी चित दीन्ह ॥7॥

बाबर साह छत्रपति राजा । राज-पाट उन कहँ बिधि साजा ॥
भुलुक सुलेमाँ कर ओहि दीन्हा । अदल दुनी ऊमर जस कीन्हा ॥
अली केर जस कीन्हेसि खाँडा । लीन्हेसि जगत समुद भरि डाँडा ॥
बल हजमा कर जैस सँभारा । जो बरियार उठा तेहि मारा ॥
पहलवान नाए सब आदी । रहा न कतहुँ बाद करि बादी ॥
बड परताप आप तप साधे । धरम के पंथ दई चित बाँधे ॥
दरब जोरि सब काहुहि दिए । आपुन बिरह आउ-जस लिए ॥
राजा होइ करै, सब छाँडि, जगत महँ राज ।
तब अस कहैं `मुहम्मद', वै कीन्हा किछु काज ॥8॥

मानिक एक पाएउँ उजियारा । सैयद असरफ पीर पियारा ॥
जहाँगीर चिस्ती निरमरा । कुल जग महँ दीपक बिधि धरा ॥
औ निहंग दरिया-जल माहाँ । बूडत कहँ धरि काढत बाहाँ ॥
समुद माहँ जो बाहति फिरई । लेतै नावँ सौहँ होइ तरई ॥
तिन्ह घर हौ मुरीद, सो पीरू । सँवरत बिनु गुन लावै तीरू ॥
कर गहि धरम-पंथ देखरावा । गा भुलाइ तेहि मारग लावा ॥
जो अस पुरुषहि मन चित लावै । इच्छा पूजै, आस तुलावै ॥
जौ चालिस दिन सेवै, बार बुहारै कोइ ।
दरसन होइ `मुहम्मद', पाप जाइ सब धोइ ॥9॥

जायस नगर मोर अस्थानू । नगर क नावँ आदि उदयानू ॥
तहाँ दिवस दस पहुने आएउँ । भा बैराग बहुत सुख पाएउँ ॥
सुख भा, सोचि एक दिन मानौं । ओहि बिनु जिवन मरन कै जानौं ॥
नैन रूप सो गएउ समाई । रहा पूरि भर हिरदय कोई ॥
जहवैं देखौं तहँवै सोई । और न आव दिस्टि तर कोई ॥
आपुन देखि देखि मन राखौं । दूसर नाहिं, सो कासौं भाखौं ॥
सबै जगत दरपन कै बेखा । आपन दरसन आपुहि देखा ॥
अपने कौकुत कारन मीर पसारिन हाट ।
मलिक मुहम्मद बिहनै होइ निकसिन तेहि बाट ॥10॥

Malik Muhammad Jayasi
About the poet

Malik Muhammad Jayasi

Malik Muhammad Jayasi (1477– 1542) was an Indian Sufi poet and pir. He wrote in the Awadhi language, and in the Persian Nastaʿlīq script. His best known work is the epic poem Padmavat (1540). Much of the information about Jayasi comes from legends, and his da…

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