आखरी कलाम 2

Malik Muhammad JayasiMalik Muhammad Jayasi1 Jan 1477

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धूत एक मारत गनि गुना । कपट-रूप नारद करि चुना ॥
`नावँ न साधु', साधि कहवावै तेहि लगि चलै जौ गारी पावै ॥
भाव गाँठि अस मुख, कर भाँजा । कारिख तेल घालि मुख माँजा ॥
परतहि दीठि छरत मोहिं लेखे । दिनहिं माँझ अँधियर मुख देखे ॥
लीन्हे चंग राति दिन रहई । परपँच कीन्ह लोगन महँ चहई ॥
भाइ बंधु महँ लाई लावै । बाप पूत महँ कहै कहावै ॥
मेहरी भेस रैनि के आवै । तरपड कै पूरुख ओनवावै ॥
मन-मैली कै ठगि ठगै, ठगै न पायौ काहु ।
वरजेउ सबहिं `मुहम्मद', असि जिन तुम पतियाहु ॥11॥

अंग चढावहु सूरी भारा । जाइ गहौ तब चंग अधारा ॥
जौ काहू सौं आनि चिहूँटै । सुनहु मोर बिधि कैसे छूटै ॥
उहै नावँ करता कर लेऊ । पढौ पलीता धूआँ देऊ ॥
जौ यह धुवाँ नासिकहि लागै । मिनती करै औ उठि उठि भागै ॥
धरि बाईं लट सीस झकोरै । करि पाँ तर, गहि हाथ मरोरै ॥
तबहि सँकोच अधिक ओहि हौवै । `छाँडहु, छाँडहु!' कहि कै रोवैं ॥
धरि बाहीं लै थुवा उडावै । तासौं डरै जो ऐस छोडावै ॥
है नरकी औ पापी, टेढ बदन औ आँखि ॥
चीन्हत उहै `मुहम्मद', झूठ-भरी सब साखि ॥12॥

नौ सै बरस छतीस जो भए । तब एहि कथा क आखर कहे ॥
देखौं जगत धुध कलि माहाँ । उवत धूप धरि आवत छाहाँ ॥
यह संसार सपन कर लेखा । माँगत बदन नैन भरि देखा ॥
लाभ, दिउ बिनु भोग, न पाउब । परिहि डाड जहँ मूर गँवाउब ॥
राति क सपन जागि पछिताना । ना जानौ कब होइ बिहाना ॥
अस मन जानि बेसाहहु सोई । मूर न घटै, लाभ जेहि होई ॥
ना जानेहु बाढत दिन जाई । तिल तिल घहै आउ नियराई ॥
अस जिन जानेहु बढत है, दिन आवत नियरात ।
कहै सो बूझि `मुहम्मद' फिर न कहौं असि बात ॥13॥

जबहिं अंत कर परलै आई । धरमी लोग रहै ना पाई ॥
जबहीं सिद्ध साधु गए पारा । तबहीं चलै चोर बटपारा ॥
जाइहि मया-मोह सब केरा । मच्छ-रूप कै आइहि बेरा ॥
उठिहैं पंडित बेद-पुराना । दत्त सत्त दोउ करिहिं पयाना ॥
धूम-बरन सूरुज होइ जाई । कृस्न बरन सब सिष्टि दिखाई
दधा पुरुब दिसि उइहै जहाँ । पुनि फिरि आइ अथइहै तहाँ ॥
चढि गदहा निकसै धरि जालू । हाथ खंड होइ, आवै कालू ॥
जो रे मिलै तेहि मारै, फिरि फिरि आइ कै गाज ।
सबही मारि `मुहम्मद', भूज अरहिता राज ॥14॥

पुनि धरती कहँ आयसु होई । उगिलै दरब, लेइ सब कोई ॥
`मोर मोर', करि उठिहैं झारी । आपु आपु महँ करिहैं मारी ॥
अस न कोई जानै मन माहाँ । जो यह सँचा अहै सो कहाँ ॥
सैंति सैंति लेइ लेइ घर भरहीं । रहस-कूद अपने जिउ करहीं ॥
खनहिं उतंग, खनहि फिर साँती । नितहि हुलंब उठै बहु बाँती ॥
पुनि एक अचरज सँचरै आई । नावँ `मजारी' भँवै बिलाई ॥
ओहि के सूँघे जियै न कोई । जो न मरै तेहि भक्खै सोई ॥
सब संसार फिराइँ औ लावै गहिरी घात ।
उनहूँ कहै `मुहम्मद' बार न लागिहि जात ॥15॥

पुनि मैकाइल आयसु पाए । उन बहु भाँति मेघ बरसाए ॥
पहिले लागै परै अँगारा । धरती सरग होइ उजियारा ॥
लागी सबै पिरथिवीं जरै । पाछे लागे पाथर परै ॥
सौ सौ मन कै एक एक सिला । चलै पिंड घुटि आवैं मिला ॥
बजर-गोट तस छूटैं भारी । टूटैं रूख बिरुख-सब झारी ॥
परत धमाकि धरति सब हालै । उधिरत उठै सरग लौं सालै ॥
अधाधार बरसै बहु भाँती । लागि रहै चालिस दिन-राती ॥
जिया-जंतु सब मरि घटे जित सिरजा संसार ।
कोइ न है `मुहम्मद', होइ बीता संघार ॥16॥

जिबरईल पाउब फरमानू । आइ सिस्टि देखब मैदानू ॥
जियत न रहा जगत केउ ठाढा । मारा झोरि कचरि सब गाढा ॥
मरि गंधाहिं, साँस नहिं आवै । उठै बिगंध, सडाइँध आवैं ॥
जाइ देऊ से करहु बिनाती । कहब जाइ जस देखब भाँती ॥
देखहु जाइ सिस्टि बेवहारू । जगत उजाड सून संसारू ॥
अस्ट दिसा उजारि सब मारा । कोइ न रहा नावँ-लेनिहारा ॥
मारि माछ जस पिरथिवीं पाटी । परै पिछानि न, दीखे माटी ॥
सून पिरथिवीं होइगई, दहुँ धरती सब लीप ।
जेतनी सिस्टि `मुहम्मद' सबै भाइ जल-दीपि ॥17॥


मकाईल पुनि कहब बुलाई । बरसहु मेघ पिरथिवीं जाई ॥
उनै मेघ भरि उठिहैं पानी । गरजि गरजि बरसहिं अतवानी ॥
झरी लागि चालिस दिन राती । घरी न निबुसै एकहु भाँती ॥
छूटि पानि परलय की नाईं । चढा छापि सगरिउँ दुनियाईं ॥
बूडहिं परबत मेरु पहारा । जल हुलि उमडि चलै असरारा ॥
जहँ लगि मगर माछ जित होई । लेइ बहाइ जाइहि भुइँ धोई ॥
सून पिरथिवीं होइहि, बूझे हँसै ठठाइ ।
एतनि जो सिस्टि `मुहम्मद', सो कहँ गई हेराइ ॥18॥

पुनि इसराफीलहि फरमाए । फूँके, सब संसार उडाए ॥
दै मुख सूर भरै जो साँसा । डोलै धरती, लपत अकासा ॥
भुवन चौदहो गिरि मनु डोला । जानौ घालि झुलाव हिंडोला ॥
पहिले एक फूँक जो आई । ऊँच-नीच एक -सम होइ जाई ॥
नदी नार सब जैहै पाटी । अस होइ मिले ज्यों ठाढी माटी ॥
दूसरि फूँक जो मेरू उडहै । परबत समुद्र एक होइ जैहैं ॥
चाँद सुरुज तारा घट टूटै । परतहि खंभ सेस घट फूटै ॥
तिसरे बजर महाउब, अस धुइँ लेब महाइ ।
पूरब पछिउँ `मुहम्मद'एक रूप होइ जाइ ॥19॥

अजराइल कहँ बेगि बोलावै । जीउ जहाँ लगि सबै लियावै ॥
पहिले जिउ जिबरैल क लेई । लोटि जीउ मैकाइल देई ॥
पुनि जिउ देइहि इसराफीलू । तीनिहु कहँ मारै अजराईलू ॥
काल फिरिस्तिन केर जौ होई । कोइ न जागौ, निसि असि होई ॥
पुनि पूछब "जम! सब जिउ लीन्हा ?। एकौ रहा बाँचि जो दीन्हा ?॥"
सुनि अजराइल आगे होइ आउब । उत्तर देब, सीस भुइँ नाउब ॥
आयसु होइ करौं अब सोई । की हम, की तुम , और न कोई ॥
जो जम आन जिउ लेत हैं, संकर तिनहू कर जिउ लेब ।
सो अवतरें मुहम्मद' देखु तहुँ जिउ देब ॥20॥

Malik Muhammad Jayasi
About the poet

Malik Muhammad Jayasi

Malik Muhammad Jayasi (1477– 1542) was an Indian Sufi poet and pir. He wrote in the Awadhi language, and in the Persian Nastaʿlīq script. His best known work is the epic poem Padmavat (1540). Much of the information about Jayasi comes from legends, and his da…

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