आखिरी कलाम 5

Malik Muhammad JayasiMalik Muhammad Jayasi1 Jan 1477

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पुनि रसूल तलफत तहँ जैहैं । बीबिहि बार बार समुझैहैं ॥
बीबी कहब, `घाम कत सहहू ? कस ना बैठि छाहँ महँ रहहू ? ॥
`सब पैगंबर बैठे छाहाँ । तुम कस तपौ बजर अस माहाँ ? ॥
कहब रसूल छाँह का बैठौं ? उमत लागि धूपहु नहिं बैठौं ॥
`तिन्ह सब बाँधि घाम महँ मेले । का भा मोरे छाहँ अकेले ॥
`तुम्हरे कोह सबहि जो मरै । समुझहु जीउ, तबहि निस्तरै ॥
जो मोहिं चहौ निवारहु कोहू । तब बिधि करै उमत पर छोहू'॥
बहु दुख देखि पिता कर, बीबी समुझा जीउ ।
जाइ मुहम्मद बिनवा , ठाढ पाग कै गीउ ॥41॥

तब रसूल के कहें भइ माया । जिन चिंता मानहु, भइ दाया ॥
जौ बीबी अबहूँ रिसियाई । सबहि उमत-सिर आइ बिसाई ॥
अब फातिम कहँ बेगि बोलावहु । देइ दाद तौ उमत छोडावहु ॥
फातिम आइ कै पार लगावा । धरि यजीद दोजख महँ गवा ॥
अंत कहा, धरि जान से मारै । जिउ देइ देइ पुनि लौटि पछारै ॥
तस मारब जेहि भुइँ गडि जाई । खन खन मारै लौटि जियाई ॥
बजर-अगिनि जारब कै छारा । लौटि दहै जस दहै लोहारा ॥
मारि मारि घिसियावैं, धरि दोजख महँ देब ।
जेतनी सिस्टि मुहम्मद सबहि पुकारै लेब ॥42॥

पुनि सब उम्मत लेब बुलाई । हरू गरू लागब बहिराई ॥
निरखि रहौती काढब छानी । करब निनार दूध औ पानी ॥
बाप क पूत, न पूत क बापू । पाइहि तहाँ न पुन्नि न पापू ॥
आपहि आप आइकै परी । कोउ न कोउ क धरहरि करी ॥
कागज काढि लेब सब लखा । दुख सुख जो पिरथिवी महँ देखा ॥
पुन्नि पियाला लेखा माँगब । उतर देत उन पानी खाँगब ॥
नैन क देखा स्रवन क सुना । कहब, करब, औगुन औ गुना ॥
हाथ, पाँव, मुख, काया, स्रवन, सीस औ आँखि ।
पाप न चपै `मुहम्मद' आइ भरैं सब साखि ॥43॥

देह क रोवाँ बैरी होइहैं । बजर-बिया एहि जीउ के बोइहैं ॥
पाप पुन्नि निरमल कै धोउब । राखब पुन्नि, पाप सब खोउब ॥
पुनि कौसर पठउब अन्हवावै । जहाँ कया निरमल सब पावै ॥
बुडकी देब देह-सुख लागी । पलुहब उठि, सोवत अस जागी ॥
खोरि नहाइ धोइ सब दुंदू । होइ निकरहिं पूनिउ कै चंदू ॥
सब क सरीर सुबास बसाई । चंदन कै अस घानी आई ॥
झूठे सबहि, आप पुनि साँचे । सबहि नबी के पाछे बाँचे ॥
नबिहि छाडि होइहि सबहि बारह बरस क राह ।
सब अस जान `मुहम्मद' होइ बरस कै राह ॥44॥

पुनि रसूल नेवतब जेवनारा । बहुत भाँति होइहि परकारा ॥
ना अस देखा, ना अस सुना । जौ सरहौं तौ है दस गुना ॥
पुनि अनेक बिस्तर तहँ डासब । बास सुबास कपूर से बासब ॥
होइ आयसु जौ बेगि बोलाउब । औ सब उमत साथ लेइ आउब ॥
जिबरईल आगे होइ जइहैं । पग डारै कहँ आयसु देइहैं ॥
चलब रसूल उमत लेइ साथा । परग परग पर नावत माथा ॥
`आवहु भीतर' बेगि बोलाउब । बिस्तर जहाँ तहाँ बैठाउब ॥
झारि उमत सब बैठी जोरि कै एकै पाँति ।
सब के माँझ मुहम्मद, जानौ दुलह बराति ॥45 ॥

पुनि जेंवन कहँ आवै लागैं । सब के आगे धरत न खाँगै ॥
भाँति भाँति कर देखब थारा । जानब ना दहुँ कौन प्रकारा ॥
पुनि फरमाउब आप गोसाईं । बहुतै दुख देखेउ दुनियाईं ॥
हाथन्ह से जेंवन मुख डारत । जीभ पसारत दाँत उघारत ॥
कूँचत खात बहुत दुख पाएउ । तहँ ऐसै जेवनार जेवाँएउँ ॥
अब जिन लौटि कस्ट जिउ करहू । सुख सवाद औ इंद्री भरहू ॥
पाँच भूत आतमा सेराई । बैठि अघाउ, उदर ना भाई ॥
ऐस करब पहुनाई, तब होइहि संतोख ।
दुखी न होहु मुहम्मद, पोखि लेहु फुर पोख ॥46॥

हाथन्ह से केहु कौर न लेई । जोइ चाह मुख पैठे सोई ॥
दाँत,जीभ,मुख किछु न डोलाउब । जस जस रुचिहै तस तस खाउब ॥
जैस अन्न बिनु कूँचै रूचै । तैस सिठाइ जौ कोऊ कूँचै ॥
एक एक परकार जो आए । सत्तर सत्तर स्वाद सो पाए ॥
जहँ जहँ जाइ के परै जुडाई । इच्छा पूजै, खाइ अघाई ॥
अनचखे रअते फर चाखा । सब अस लेइ अपरस रस चाखा ॥
जलम जलम कै भूख बुझाई । भोजन केरे साथै जाई ॥
जेंवन अँचवन होइ पुनि, पुनि होइहि खिलवान ।
अमृत-भरा कटोरा पियहु मुहम्मद पान ॥47॥

एक तौ अमृत बास कपूरा । तेहि कहँ कहाँ शराब-तहूरा ॥
लागब भरि भरि देइ कटोरा । पुरुष ज्ञान अस भरै महोरा ॥
ओहि कै मिठाइ माति एक दाऊँ । जलम न मानव होइ अब काहूँ ॥
सचु-मतवार रहब होइ सदा । रहसै कूदै सदा सरबदा ॥
कबहुँ न खोवै जलम खुमारी । जनौ बिहान उठै भरि बारी ॥
ततखन बासि बासि जनु घाला । घरी घरी जस लेब पियाला ॥
सबहि क भा मन सो मद पिया । नव औतार भवा औ जिया ॥
फिरै तँबोल, मया से कहब `अपुन लेइ खाहु ।
भा परसाद, मुहम्मद, उठि बिहिस्त महँ जाहु ' ॥48॥

कहब रसूल `बिहिस्त न जाऊँ । जौ लगि दरस तुम्हार न पाऊँ ।
उघर न नैन तुमहिं बिनु देखे । सबहि अँविरथा मोरे लेखे ॥
तौ लै केहु बैकुंठ न जाई । जझौ लै तुम्हरा दरस न पाई ॥
करु दीदार, देखौं मै तोहीं । तौ पै जीउ जाइ सुख मोहीं ॥
देखें दरस नैन भरि लेऊँ । सीस नाइ पै भुइँ कहँ देऊँ ॥
जलम मोर लागा सब थारा । पलुहै जीउ जो गीउ उभारा ॥
होइ दयाल करु दिस्टि फिरावा । तोहि छाँडि मोहि और न भावा ॥
सीस पायँ भुइँ लावौं, जौ देखौं तोहि आँखि ।
दरसन देखि मुहम्मद , हिये भरौं तोरि साखि ॥49॥

सुनहु रसूल ! होत फरमानू । बोल तुम्हार कीन्ह परमानू ॥
तहाँ हुतेउँ जहँ हुतेउ न ठाऊँ । पहिले रचेउँ मुहम्मद नाऊँ ॥
तुम बिनु अबहुँ न परगट कीन्हेंउँ । सहस अठारह कहँ जिउ दीन्हेउँ ॥
चौदह खँड ऊपर तर राखेउँ । नाद चलाइ भेद बहु भाखेउँ ॥
चार फिरिस्तन बड औतारेउँ । सात खंड बैकुंठ सँवारेउँ ॥
सवा लाख पैगंबर सिरजेउँ । कर करतूति उन्हहि धै बँधेउँ ॥
औरन्ह कर आगे कत लेखा । जेतना सिरजा को ओहि देखा ? ॥
तुम तहँ एता सिरजा, आप कै अंतरहेत ।
देखहु दरस मुम्मद ! आपनि उमत समेत ॥50॥

Malik Muhammad Jayasi
About the poet

Malik Muhammad Jayasi

Malik Muhammad Jayasi (1477– 1542) was an Indian Sufi poet and pir. He wrote in the Awadhi language, and in the Persian Nastaʿlīq script. His best known work is the epic poem Padmavat (1540). Much of the information about Jayasi comes from legends, and his da…

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