आखिरी कलाम 3

Malik Muhammad JayasiMalik Muhammad Jayasi1 Jan 1477

6 min read · 13.0K reads

पुनि फरमाए आपु गोसाईं । तुमहि दैउ जिवाइहि नाहीं ॥
सुनि आयसु पाछे कहँ ढाए । तिसरी पौरि नाँघि नहिं पाए ॥
परत जीउ जब निसरन लागै । होइ बड कष्ट, घरी एक जागै ॥
प्रान देत सँवरै मन माहाँ । उवत धूप धरि आवत छाहाँ ॥
जस जिउ देत मोहिं दुख होई । ऐसै दुखै अहा सब कोई ॥
जौ जनत्यों अस दुख जिउ देता । तौ जिउ काहू केर न लेता ॥
लौटि काल तिनहूँ कर होवै । आइ नींद, निधरक होइ सोवै ॥
भंजन, गढन सँवारन जिन खेला सब खेल ।
सब कहँ टारि `मुहम्मद',अब होइ रहा अकेल ॥21॥

चालिस बरस जबहिं होइ जैहै । उठिहि मया, पछिले सब ऐहैं ॥
मया-मोह कै किरपा आए । आपहि काहिं आप फरमाए ॥
मैं संसार जो सिरजा एता । मोर नावँ कोई नहिं लेता ॥
जेतने परे सब सबहि उठावौं । पुलसरात कर पंथ रेंगावौं ॥
पाछे जिए पूछौं अब लेखा । नैन माँह जेता हौं देखा ॥
जस जाकर सरवन मैं सुना । धरम पाप, गुन औगुन गुना ॥
कै निरमल कौसर अन्हवावौं । पुनि जीउन्ह बैकुंठ पठावौं ॥
मरन गँजन घन होइ जस, जस दुख देखत लोग ।
तस सुख होइ `मुहम्मद', दिन दिन मानैं भोग ॥22॥

पहिले सेवक चारि जियाउब । तिन्ह सब काजै-काज पठाउब ॥
जिबराइल औ मैकाईल । असराफील औ अजराईलू ॥
जिबरईल पिरथिवीं महँ आए । आइ मुहम्मद कहँ गोहराए ॥
जिबरईल जग आइ पुकारब । नावँ मुहम्मद लेत हँकारब ॥
होइहैं जहाँ मुहम्मद नाऊँ । कहउ लाख बोलिहैं एक ठाऊँ ॥
ढूढत रहै, कहहुँ नहिं पावै । फिरि कै जाइ मारि गोहरावै ॥
कहै "गोसाइँ ! कहाँ वै पावौं । लखन बोलै जौ रे बोलावौं ॥
सब धरती फिरि आएउँ, जहाँ नावँ सो लेउँ ।
लाखन उठैं मुहम्मद, केहि कहँ उत्तर देउँ ॥23॥

जिबराइल पुनि आयसु पावै । "सूँघे जगत ठाँव सो पावै ॥
बास सुबास लेउ हैं जहाँ । नाव रसूल पुकारसि तहाँ ॥"
जिबराइल फिरि पिरथिवीं आए । सूँघत जगत ठाँव सो पाए ॥
उठहु मुहम्मद, होहु बड नेगी । देन जोहार बोलावहिं बेगी ॥
बेगि हँकारेउ उमत समेता । आवहु तुरत साथ सब लेता ॥
एतने बचन ज्योंहि मुख काढे । सुनत रसूल भए उठि ठाढे ॥
जहँ लगि जीउ मुकहि सब पाए । अपने अपने पिंजरे आए ॥
कइउ जुगन के सोवत उठे लोग मनो जागि ।
अस सब कहैं `मुहम्मद' नैन पलक ना लागि ॥24॥

उठत उमत कहँ आलस लागै । नींद-भरी सोवत नहिं जागै ॥
पौढत बार न हम कहँ भएऊ । अबहिंन अवधि आइ कब गएऊ ॥
जिबराइल तब कहब पुकारी । अबहूँ नींद न गई तुम्हारी ॥
सोवत तुमहिं कइउ जुग बीते । ऐसे तौ तुम मोहे, न चीते ॥
कइउ करोरि बरस भुइँ परे । उठहु न बेगि मुहम्मद खरे ॥
सुनि कै जगत उठिहि सब झारी । जेतना सिरजा पुरुष औ नारी ॥
नँगा-नाँग उठिहै संसारू । नैना होइहैं सब के तारू ॥
कोइ न केहु तन हेरै, दिस्टि सरग सब केरि ।
ऐसे जतन `मुहम्मद', सिस्टि चलै सब घेरि ॥25॥

पुनि रसूल जैहैं होइ आगे । उम्मत चलि सब पाछे लागै ॥
अंध गियान होइ सब केरा । ऊँच नीच जहँ होइ अभेरा ॥
सबही जियत चहैं संसारा । नैनन नीर चलै असरारा ॥
सो दिन सँवरि उमत सब रोवै । ना जानौं आगे कस होवै ॥
जो न रहै, तेहि का यह संगा ? मुख सूखै तेहि पर यह दंगा ॥
जेहि दिन कहँ नित करत डरावा । सोइ दिवस अब आगे आवा ॥
जौ पै हमसे लेखा लेबा । का हम कहब, उतर का देबा ॥
एत सब सँवरि कै मन महँ चहैं जाइ सो भूलि ।
पैगहि पैग 'मुहम्मद' चित्त रहै सब झुलि ॥26॥

पुल सरात पुनि होइ अभेरा । लेखा लेब उमत सब केरा ॥
एक दिसि बैठि मुहम्मद रोइहैं । जिबरईल दूसर दिसि होइहैं ॥
वार पार किछु सूझत नाहीं । दूसर नाहिं, को टैकै बाहीं ?॥
तीस सहस्त्र कोस कै बाटा । अस साँकर जेहि चलै न चाँटा ॥
बारहु तें पतरा अस झीना । खडग-धार से अधिकौ पैना ॥
दोउ दिसि नरक-कुंड हैं भरे । खोज न पाउब तिन्ह महँ परे ॥
देखत काँपै लागै जाँघा । सो पथ कैसे जैहै नाँघा ॥
तहाँ चलत सब परखब, को रे पूर, को ऊन ।
अबहिं को जान `मुहम्मद', भरे पाप औ पून ॥27॥

जो धरमी होइहि संसारा । चमकि बीजु अस जाइहि पारा ॥
बहुतक जनौं तुरँग भल धइहैं । बहुतक जानु पखेरु उडइहैं ॥
बहुतक चाल चलै महँ जइहैं । बहुतक मरि मरि पावँ उठइहैं ॥
बहुतक जानु पखेरु उडइहैं । पवन कै नाईं तेहि महँ जइहैं ॥
बहुतक जानौं रेंगहिं चाँटी । बहुतक बहैं दाँत धरि माटी ॥
बहुतक नरक-कुंड महँ गिरहीं । बहुतक रकत पीब महँ परहीं ॥
जेहि के जाँघ भरोस न होई । सो पंथी निभरोसी रोई ॥
परै तरास सो नाँघत, कोइ रे वार, कोइ पार ।
कोइ तिर रहा`मुहम्मद', कोइ बूडा मझ-धार ॥28॥

लौटि हँकारब वह तब भानू । तपै कहैं होइहि फरमानू ॥
पूछब कटक जेता है आवा । को सेवक, को बैठे खावा ?॥
जेहि जस आउ जियन मैं दीन्हा । तेहि तस चाहौं लीन्हा ॥
अब लगि राज देस कर भूजा । अब दिन आइ लेखा कर पूजा ॥
छः मास कर दिन करौं आजू । आउ क लेउँ औ देखौं साजू ॥
से चौराहै बैठे आव । एक एक जन कँ पूछि पकरावै ॥
नीर खीर हुँत काढब छानी । करब निनार दूध और पानी ॥
धरम पाप फरियाउब, गुन औगुन सब दोख ।
दुखी न होहु `मुहम्मद', जोखि लेब धरि जोख ॥29॥

पुनि कस होइहि दिवस छ मासू । सूरुज आइ तपहिं होइ पासू ॥
कै सउँहैं नियरे रथ हाँकै । तेहिकै आँच गूद सिर पाकै ॥
बजरागिनि अस लागै तैसे । बिलखैं लोग पियासन बैसे ॥
उनै अगिन अस बरसै घामू । भूँज देह, जरि जावै चामू ॥
जेइ किछु धरम कीन्ह जग माँहा । तेहि सिर पर किछु आवै छाहाँ ॥
धरिमिहि आनि पियाउब पानी । पापी बपुरहि छाहँ न पानी ॥
जो राजता सो काज न आवै । इहाँ क दीन्ह उहाँ सो पावै ॥
जो लखपती कहावै, लहैन कोडी आधि ।
चौदह धजा `मुहम्मद', ठाढ करहिं सब बाँधि ॥30॥

Malik Muhammad Jayasi
About the poet

Malik Muhammad Jayasi

Malik Muhammad Jayasi (1477– 1542) was an Indian Sufi poet and pir. He wrote in the Awadhi language, and in the Persian Nastaʿlīq script. His best known work is the epic poem Padmavat (1540). Much of the information about Jayasi comes from legends, and his da…

View profile & all 23 Poems / Stories

More from Malik Muhammad Jayasi

  1. आखरी कलाम 1

    पहिले नावँ दैउ कर लीन्हा । जेइ जिउ दीन्ह, बोल मुख कीन्हा ॥दीन्हेसि सिर जो सँवारै पागा । दीन्हेसि कया जो पहिरै बागा ॥

    13.2K reads
  2. आखरी कलाम 2

    धूत एक मारत गनि गुना । कपट-रूप नारद करि चुना ॥`नावँ न साधु', साधि कहवावै तेहि लगि चलै जौ गारी पावै ॥

    13.0K reads
  3. आखिरी कलाम 4

    सवा लाख पैगंबर जेते । अपने अपने पाएँ तेते ॥एक रसूल न बैठहिं छाहाँ । सबही धूप लेहिं सिर माहाँ ॥

    13.7K reads
  4. आखिरी कलाम 5

    पुनि रसूल तलफत तहँ जैहैं । बीबिहि बार बार समुझैहैं ॥बीबी कहब, `घाम कत सहहू ? कस ना बैठि छाहँ महँ रहहू ? ॥

    12.9K reads
  5. आखिरी कलाम 6

    सुनि फरमान हरष जिउ बाढे । एक पाँव से भए उठि ढाढे ॥झारि उमत लागी तब तारी । जेता सिरजा पुरुष औ नारी ॥

    12.9K reads

More Poetry & Stories You May Like

उसने मिट्टी को छुआ भर था - प्रताप सोमवंशीपसोपेश में हूँकि कविता चिह्नों में होती है— प्रताप सोमवंशीदर्द औरों का हम - प्रताप सोमवंशीपसोपेश में हूँकि कविता चिह्नों में होती है— प्रताप सोमवंशीये दरवेशों की बस्ती है यहाँ ऐसा नहीं होगाये दरवेशों की बस्ती है यहाँ ऐसा नहीं होगालिबास-ए-ज़िंदगी फट जाएगा मैला नहीं होगा— मुनव्वर रानाचले मक़्तल की जानिब और छाती खोल दी हम नेचले मक़्तल की जानिब और छाती खोल दी हम नेबढ़ाने पर पतंग आए तो चर्ख़ी खोल दी हम ने— मुनव्वर रानाकुछ नहीं चाहने वाली लड़कीसोलह की यह लड़की दो-तीन साल पहले तकपेड़-पौधों पर रखती थी पाँव— ऐश्वर्य राजआंबेडकर“तुम्हारे दीन मुखों को देखकरकरुणा भरे स्वरों को सुनकर— बी. गोपाल रेड्डी