फूल से आग

लनचेनबा मीतैलनचेनबा मीतै

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तुम अपरिचित हो फूल की सुगंध से। नहीं आता सूँघना भी।

तुम अनजान हो फूलों के रूप से। नहीं जानते उन्हें निहारना भी।

तुम्हें तो बस तोड़ना है। मसलना है। कुचलना है।

या फिर :

नग्न धूप ज्वाला का

रोम-रोम से

चिंगारियाँ बरसाता नृत्य

कोलतार की सड़क के बीचोंबीच फेंकना है।

उसी से हो गईं हैं एक-एक कर

कोमल-मृदुल पंखड़ियाँ धधकती ज्वाला

मनोहारी सुगंध

नहीं सह सकती आग का ताप।

लनचेनबा मीतै
About the poet

लनचेनबा मीतै

मणिपुरी भाषा की ‘युवा कविता धारा’ के प्रतिनिधि कवि। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित।

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