तुम्हारी धमनियों में
मैले-कुचैले टीलों के समूह असंख्य
सिर उठाए ठठाकर हँसते रहे बार-बार।
उस दौरान
लंबे नाख़ून और
फड़कती मांसपेशियों वाले रोएँदार अँधेरे के लंबे हाथ
घुसते रहे असंख्य बार
तुम्हारे कुँआरे गर्भ की अक्षत कोमल गहराई में
सहन किया मैंने
जबड़े भींच कर सहा
किंतु आज
अँधेरे के हाथों ने तार-तार कर डाला बलात्
पारदर्शी आवरण तुम्हारा
नोच-खसोट डाले तुम्हारे-मेरे ख़ून के रिश्ते
फेंक दिया मुझे गला झिंझोड़ मोसतोस कर
खेतों-मैदानों में तुम्हारे फटे गर्भ से दूर
जुते खेत के कठोर ढेलों पर गिर
उठी आँखों में आँसू की लहरें, सोचा मैने—
नहीं आऊँगा फिर तुम्हारे निकट
छोड़ जाऊँगा तुम्हें सदा को
अग्नि-वरण के संकल्प से तुम्हारे लिए
पुराने अभ्यास की पोशाक के साथ-साथ
जन्म से सहजात
तुम्हारे प्रेम की यह पवित्र पोशाक भी
उतार फेंकूँगा, देह पर न रहेगा कुछ
धारण कर सूर्य को मुकुट सा
लिए क्रोधाग्नि-ज्वाला हाथ पर
दौड़ा मैं नंगा ही
दौड़ता रहा गंतव्यहीन
हे इम्फाल नगरी
बलात् फाड़ डाले गए तुम्हारे गर्भ से
दूर
बहुत दूर
चरण-कमलों की कोमल पंखुड़ियाँ
निर्दयतापूर्वक छीन लीं मुझसे चीर-फाड़कर
घास की नोकों के असंख्य काँटों ने
फिर भी
दौड़ता ही रहा मैं
दौड़ता रहा उसी तरह
अकथनीय-अदृश्य
मनोवृत्ति द्वारा रचित सीमा के पार
जैसे-तैसे
संध्या का पवन
साँस रोके दौड़ता आया सामने अकस्मात्
व्योम पर छाई काली घटाएँ
भेद आने वाली तेजस्वी सूर्य-किरणों की अर्गला सा
तान दोनों हाथ रोकते हुए
घबड़ाते हुए बोला—
दूर से आती इस क्रंदन-ध्वनि को
सुनो तो ध्यान से एक बार...”
उसी समय :
हे इम्फाल नगरी
मेरी न हो सकने वाली प्रिय नगरी!
अश्रुपूरित सिसकन में रोईं तुम—
मायका धधक रहा ज्वाला में
संतानें नहीं हैं क्या, बुझाओ यह ज्वाला।”








