कर्णफूल हुए बिना झर जाने का दुख

लनचेनबा मीतैलनचेनबा मीतै

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एक आलोक

शांत और धीमा

निगल लिया अचानक

काले घने अंधकार ने

और समा गया वह अंधकार

मेरी देह में

सर्वत्र

उस आलोक में खिलने को प्रयत्नशील

एक सौ आठ पंखुरियों वाला कमल

डूब हृदय-सागर में

रोया हिचकियों के साथ

पुनः विकसित न हो पाने से

उड़ आए उस रुदन के स्वर में गूँजते

आँखें और चेहरा ढके

असंख्य भँवरे

मेरा रोम-रोम धकियाते

छोड़े एक के बाद एक

तेज़ विषैले तीर

आलोक निगले

अँधेरे के वक्ष पर

उसके बाद युद्ध :

बाह्य और आंतरिक का

आंतरिक और बाह्य का

खुले में होने वाला रहस्यमय युद्ध

रहस्यमयता के बीच होने वाला खुला युद्ध

इस असीम युद्ध के तेज़ झोंके

आने शुरु हुए चारों ओर से जब लगातार

झरने लगीं मेरे

अश्रु-तरंगित हृदय-सागर में

एक सौ आठ पंखुरियों वाले कमल की

समस्त पंखुरियाँ एक-एक कर

उसके बाद गिर पड़ा

पंखुरी हीन

गंजा कमल

हृदय-सागर में डंठल से

पुन: उठ सके बिना।

लनचेनबा मीतै
About the poet

लनचेनबा मीतै

मणिपुरी भाषा की ‘युवा कविता धारा’ के प्रतिनिधि कवि। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित।

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