निद्रा देवी नेत्रासन से
उतरकर चली गई हटा काली यवनिका
तत्काल :
गर्भ से सद्यजात विचार
भागा उसे खोजने
नहीं मिली। एकदम नहीं मिली।
लौटा पीठ पर लादे पश्चाताप का भारी बोझ
प्राणपण से जुटाकर सारी शक्तियाँ
फेंक दिया दृष्टि का सघन विशाल जाल
निस्सीम-नील-व्योम-सागर में
फँस गईं
निर्मल जल तरंगों में नृत्यरत
रजत-मीन उछल-उछल।
निर्जन में मत्त वायु द्वारा जन्मे
आवारा-ज़िद्दी बालक
लिए कँटीली सण्टियाँ
खेल रहे बार-बार कर प्रहार
श्यामल सी जल-घास मध्य नमित पलकों उठी ग्रीवा वाले
अर्ध-विकसित सूर्य के रक्त-कोमल कपोलों पर।
आज :
खिले सूर्य के क्षत-विक्षत कपोलों से
अनवरत बहते रक्त-कण
फोड़ नष्ट कर रहे धीरे-धीरे
रात भर आँसुओं से घोंसला बुनने वाले
तारों के अगणित बुलबुले
नील-व्योम-सागर में।








