तरक़्क़ी

लाल्टूलाल्टू10 Sept 1957

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तरक़्क़ी।

इतनी कि लिखना चाह कर भी रुकता है मन।

लैंग्वेज़ इनपुट ठीक है, यूनिकोड कैरेक्टर्स हैं, प्यार पर्दे पर बरसने को है, पर

मन कहता है लिखो प्यार और फ़ोन आता है कि चलो इकट्ठे होना है

क्या करें

कितनी बार कितना विरोध करें कि जंगख़ोर धरती की आह सुन लें।

कहना है ख़ुद से कि तरक़्क़ी हुई है

प्यार को रोक नहीं सकी है नफ़रत की आग

वो अपनी जंगें लड़ें

हम अपनी लड़ेंगे

हुई है तरक़्क़ी

उनकी अपनी और हमारी अपनी

सड़क पर होंगे तो गीत गाएँगे

घर दफ़्तर में लैंग्वेज़ इनपुट ठीक है, यूनिकोड कैरेक्टर्स हैं, प्यार पर्दे पर बरसता रहेगा।

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