Selected Quotes
Poetry & Stories
लोग ही चुनेंगे रंग
चुप्पी के ख़िलाफ़किसी विशेष रंग का झंडा नहीं चाहिए
नाज़ुक
जिस्म बड़ी नाज़ुक चीज़ है। छोटी-सी छुरी चमड़ा चीर देती है और जिस्म में हर कुछ जो ठोस है धराशायी हो जाता है। फ़ौज-पुलिस के गोली-डंडे ठोस हड्डियों को चूरमचूर कर देते हैं। विज्ञान में ठोस और द्रव का फ़र्क़ पढ़ते हैं, बहता तो पूरा जिस्म है। गोलियों से छलनी जिस्म में से ठोस सपने उड़ जाते हैं और किसी और नाज़ुक जिस्म में बस जाते हैं। धरती और आस्माँ भी नाज़ुक हैं। खरबों साल बाद आग का गोला जो सूरज है, ठोस दिखता गैस का बवंडर ख़त्म हो जाएगा। आख़िर में कोई नहीं जीतता, न इंसान, न आस्माँ। फ़ौज-पुलिस तो कभी नहीं जीतती।सचमुच ठोस है वह जो हर किसी को नाज़ुक दिखता है—प्यार।
मैं और तुम
मैं फूल हूँधूप की तरफ़ मुड़ता हुआ
विसर्जन
मिट्टी मिलती है मिट्टी मेंयही देखकर ख़ुश हैं लोग
कविता
बहुत बड़ा शहरबहुत बड़ा अँधेरा
लाल्टू: Quick Answers
When was लाल्टू born?
लाल्टू was born on 10 September 1957. Associated place: कोलकाता, भारत.
Where can I read लाल्टू's poetry?
Kavishala has 50 poems and stories by लाल्टू, free to read on this page, along with selected quotes you can share.
Poems & Stories by लाल्टू
लोग ही चुनेंगे रंग
चुप्पी के ख़िलाफ़किसी विशेष रंग का झंडा नहीं चाहिए
नाज़ुक
जिस्म बड़ी नाज़ुक चीज़ है। छोटी-सी छुरी चमड़ा चीर देती है और जिस्म में हर कुछ जो ठोस है धराशायी हो जाता है। फ़ौज-पुलिस के गोली-डंडे ठोस हड्डियों को चूरमचूर कर देते हैं। विज्ञान में ठोस और द्रव का फ़र्क़ पढ़ते हैं, बहता तो पूरा जिस्म है। गोलियों से छलनी जिस्म में से ठोस सपने उड़ जाते हैं और किसी और नाज़ुक जिस्म में बस जाते हैं। धरती और आस्माँ भी नाज़ुक हैं। खरबों साल बाद आग का गोला जो सूरज है, ठोस दिखता गैस का बवंडर ख़त्म हो जाएगा। आख़िर में कोई नहीं जीतता, न इंसान, न आस्माँ। फ़ौज-पुलिस तो कभी नहीं जीतती।सचमुच ठोस है वह जो हर किसी को नाज़ुक दिखता है—प्यार।
मैं और तुम
मैं फूल हूँधूप की तरफ़ मुड़ता हुआ
विसर्जन
मिट्टी मिलती है मिट्टी मेंयही देखकर ख़ुश हैं लोग
कविता
बहुत बड़ा शहरबहुत बड़ा अँधेरा
वह आदमी बस के इंतज़ार में
वह आदमी बस के इंतज़ार मेंसड़क के तक़रीबन बीचोंबीच आ खड़ा है
प्रासंगिक
लंबे समय तक ख़ाली मकान की बालकनी में बना उसका घोंसला उखड़ चुका था।ठंड की बारिश के दिन, मकान के अंदर रज़ाई में दुबकी तकलीफ़ें।
बाहर अंदर
बाहर लू चलने को हैजो कमरे में बंद हैं क़िस्मत उनकी
तस्वीर
यह तस्वीर कभी पूरी नहीं होगीइसमें एक औरत है
देशभक्त
दिन दहाड़े जिसकी हत्या हुईजिसने हत्या की।
मैं तुमसे क्या ले सकता हूँ?
मैं तुमसे क्या ले सकता हूँ?अगर ऐसा पूछो तो मैं क्या कहूँगा।
हाज़िरजवाब नहीं हूँ
हाज़िरजवाब लोगजवाब देने के बाद होते हैं निश्चिंत
Selected Quotes by लाल्टू (चुनिंदा उद्धरण)
मैं फूल हूँधूप की तरफ़ मुड़ता हुआमिट्टी मिलती है मिट्टी मेंयही देखकर ख़ुश हैं लोगबहुत बड़ा शहरबहुत बड़ा अँधेराछोटी-सी छुरी चमड़ा चीर देती है और जिस्म में हर कुछ जो ठोस है धराशायी हो जाता है।लंबे समय तक ख़ाली मकान की बालकनी में बना उसका घोंसला उखड़ चुका था।ठंड की बारिश के दिन, मकान के अंदर रज़ाई में दुबकी तकलीफ़ें।चुप्पी के ख़िलाफ़किसी विशेष रंग का झंडा नहीं चाहिएVideos on लाल्टू
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