आओ

लाल्टूलाल्टू10 Sept 1957

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शमशेर की दूब

पुकारती है

नर्म नहीं सही घिस चुकी वक़्त के भार से

मख़मली नहीं कर्कश है क़ालीन

धमनियाँ धड़कती हैं उँगलियाँ टटोलती हैं शून्य

संगीत भी होता है पीला इस उम्र में

लय नहीं टूटी धीमी हुई है अगर

आओ!

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