एक बार तो देख

बालकृष्ण शर्मा नवीनबालकृष्ण शर्मा नवीन8 Mar 1897 – 29 Sept 1960

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एक बार तो देख, अरे जग मेरी डंडा-बेड़ी;

एक बार तो देख : कट गयी है यह मेरी एड़ी;

टेढ़ी-मेढ़ी यह मदमाती मेरी चाल निहार,

झन-झन-झन-झन करता है हम मस्तों का संसार;

गुर्राते झन्नाते फिरते हैं ये मेरे शेर

ओ जग, ज़रा देख तो हैं याँ कैसे विकट दिलेर!

यहाँ बेड़ियों की उठती है स्वर-झंकार-हिलोर,

बैरक और अड़गड़ों में, चक्कर में, चारों ओर;

झन-झन-खन-खन की यह जीवन-दर्शक मोहक टेक—

बार-बार उठ-उठ आती है यों ही एकाएक;

सुन ले, कान लगाकर सुन ले ओ जग इसको आज,

अरे, देख तो इन बँधुओं का फैला यहाँ स्वराज!

नहीं बेड़ियों की यह झन-झन यह है जीवन-मंत्र,

काँप रहा है सुनकर जिसको क्षण-क्षण शासन-तंत्र;

वे पशुबल के अधिनायक क्या जानें इसका तत्त्व!

निज सर्वस्व होम कर ही है मिलता मुक्त निजत्व।

बालकृष्ण शर्मा नवीन
About the poet

बालकृष्ण शर्मा नवीन

बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' (१८९७ - १९६० ई०) हिन्दी कवि थे। वे परम्परा और समकालीनता के कवि हैं। उनकी कविता में स्वच्छन्दतावादी धारा के प्रतिनिधि स्वर के साथ-साथ राष्ट्रीय आंदोलन की चेतना, गांधी दर्शन और संवेदनाओं की झंकृतियां समान ऊर्जा और उठान के साथ सुनी जा सकती…

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