एक बार तो देख, अरे जग मेरी डंडा-बेड़ी;
एक बार तो देख : कट गयी है यह मेरी एड़ी;
टेढ़ी-मेढ़ी यह मदमाती मेरी चाल निहार,
झन-झन-झन-झन करता है हम मस्तों का संसार;
गुर्राते झन्नाते फिरते हैं ये मेरे शेर
ओ जग, ज़रा देख तो हैं याँ कैसे विकट दिलेर!
यहाँ बेड़ियों की उठती है स्वर-झंकार-हिलोर,
बैरक और अड़गड़ों में, चक्कर में, चारों ओर;
झन-झन-खन-खन की यह जीवन-दर्शक मोहक टेक—
बार-बार उठ-उठ आती है यों ही एकाएक;
सुन ले, कान लगाकर सुन ले ओ जग इसको आज,
अरे, देख तो इन बँधुओं का फैला यहाँ स्वराज!
नहीं बेड़ियों की यह झन-झन यह है जीवन-मंत्र,
काँप रहा है सुनकर जिसको क्षण-क्षण शासन-तंत्र;
वे पशुबल के अधिनायक क्या जानें इसका तत्त्व!
निज सर्वस्व होम कर ही है मिलता मुक्त निजत्व।








