प्रासंगिक

लाल्टूलाल्टू10 Sept 1957

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लंबे समय तक ख़ाली मकान की बालकनी में बना उसका घोंसला उखड़ चुका था।

ठंड की बारिश के दिन, मकान के अंदर रज़ाई में दुबकी तकलीफ़ें।

उड़ने की आदत में चाय की जगह कहाँ

वे बार-बार लौटते, अपना घोंसला ढूँढ़ते।

शीशे की खिड़कियों से दिखता आदमी उनके पँखों की फड़फड़ाहट पर झल्लाता हुआ।

सुबह सुबह अख़बार।

विस्फ़ोट, बेघरी, बेबसी और राजकन्या को परेशान करने वाले सनकी आदमी की गिरफ़्तारी।

शीशों पार दुनिया में तकलीफ़ें।

निरंतर वापस आना उनका ढूँढ़ना घोंसला

प्रासंगिक।

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