वह आदमी बस के इंतज़ार में

लाल्टूलाल्टू10 Sept 1957

1 min read · 12.4K reads

वह आदमी बस के इंतज़ार में

सड़क के तक़रीबन बीचोंबीच आ खड़ा है

वह आदमी बीड़ी पी चुका है और

अब ज़रा-सा हटकर थूक रहा है

वह आदमी मोपेड पर बैठा

अपनी हो सकती प्रेमिका के साथ

हँस कर बात कर रहा है वह आदमी

किताब बग़ल में थामे सोच रहा है कि

कितना अच्छा है कि

शहरीकरण से मजबूर हो जाते हैं

लोग कुछ देर के लिए सही जात-पात भूलने को

वह आदमी भीड़ से चिढ़ते हुए बढ़ रहा

क़दम-क़दम वह आदमी थक चुका है

इतने सारे आदमियों से और बना है

आकाश समेट लिया है उसने सभी

आदमियों को अपने घेरे में

बस आती है तो अकेली नहीं

दुकेली आती है दो बसों में चढ़ते हैं

आदमी दो बसों से उतरते हैं आदमी

आकाश बना आदमी देखता है

आदमी इधर आदमी उधर

फैलाता है ज़रा-सा और अँधेरी चादर

आदमी बस के इंतज़ार में

सड़क के तक़रीबन बीचोंबीच आ खड़ा है।

लाल्टू
About the poet

लाल्टू

View profile & all 50 Poems / Stories

More from लाल्टू

  1. लोग ही चुनेंगे रंग

    चुप्पी के ख़िलाफ़किसी विशेष रंग का झंडा नहीं चाहिए

    12.4K reads
  2. नाज़ुक

    जिस्म बड़ी नाज़ुक चीज़ है। छोटी-सी छुरी चमड़ा चीर देती है और जिस्म में हर कुछ जो ठोस है धराशायी हो जाता है। फ़ौज-पुलिस के गोली-डंडे ठोस हड्डियों को चूरमचूर कर देते हैं। विज्ञान में ठोस और द्रव का फ़र्क़ पढ़ते हैं, बहता तो पूरा जिस्म है। गोलियों से छलनी जिस्म में से ठोस सपने उड़ जाते हैं और किसी और नाज़ुक जिस्म में बस जाते हैं। धरती और आस्माँ भी नाज़ुक हैं। खरबों साल बाद आग का गोला जो सूरज है, ठोस दिखता गैस का बवंडर ख़त्म हो जाएगा। आख़िर में कोई नहीं जीतता, न इंसान, न आस्माँ। फ़ौज-पुलिस तो कभी नहीं जीतती।सचमुच ठोस है वह जो हर किसी को नाज़ुक दिखता है—प्यार।

    12.4K reads
  3. मैं और तुम

    मैं फूल हूँधूप की तरफ़ मुड़ता हुआ

    12.4K reads
  4. विसर्जन

    मिट्टी मिलती है मिट्टी मेंयही देखकर ख़ुश हैं लोग

    12.4K reads
  5. कविता

    बहुत बड़ा शहरबहुत बड़ा अँधेरा

    12.4K reads

More Poetry & Stories You May Like