वह आदमी बस के इंतज़ार में
सड़क के तक़रीबन बीचोंबीच आ खड़ा है
वह आदमी बीड़ी पी चुका है और
अब ज़रा-सा हटकर थूक रहा है
वह आदमी मोपेड पर बैठा
अपनी हो सकती प्रेमिका के साथ
हँस कर बात कर रहा है वह आदमी
किताब बग़ल में थामे सोच रहा है कि
कितना अच्छा है कि
शहरीकरण से मजबूर हो जाते हैं
लोग कुछ देर के लिए सही जात-पात भूलने को
वह आदमी भीड़ से चिढ़ते हुए बढ़ रहा
क़दम-क़दम वह आदमी थक चुका है
इतने सारे आदमियों से और बना है
आकाश समेट लिया है उसने सभी
आदमियों को अपने घेरे में
बस आती है तो अकेली नहीं
दुकेली आती है दो बसों में चढ़ते हैं
आदमी दो बसों से उतरते हैं आदमी
आकाश बना आदमी देखता है
आदमी इधर आदमी उधर
फैलाता है ज़रा-सा और अँधेरी चादर
आदमी बस के इंतज़ार में
सड़क के तक़रीबन बीचोंबीच आ खड़ा है।








