बाहर लू चलने को है
जो कमरे में बंद हैं क़िस्मत उनकी
क़ैद में ही सुकून
ख़ूबसूरत सपनों में लू नहीं चलती
यह बात और कि कमरे में बंद
आदमी के सपने ख़ूबसूरत नहीं होते
कोई है कि वक़्त की क़ैद में है
बाहर लू चलने को है।
बाहर लू चलने को है
जो कमरे में बंद हैं क़िस्मत उनकी
क़ैद में ही सुकून
ख़ूबसूरत सपनों में लू नहीं चलती
यह बात और कि कमरे में बंद
आदमी के सपने ख़ूबसूरत नहीं होते
कोई है कि वक़्त की क़ैद में है
बाहर लू चलने को है।

चुप्पी के ख़िलाफ़किसी विशेष रंग का झंडा नहीं चाहिए
जिस्म बड़ी नाज़ुक चीज़ है। छोटी-सी छुरी चमड़ा चीर देती है और जिस्म में हर कुछ जो ठोस है धराशायी हो जाता है। फ़ौज-पुलिस के गोली-डंडे ठोस हड्डियों को चूरमचूर कर देते हैं। विज्ञान में ठोस और द्रव का फ़र्क़ पढ़ते हैं, बहता तो पूरा जिस्म है। गोलियों से छलनी जिस्म में से ठोस सपने उड़ जाते हैं और किसी और नाज़ुक जिस्म में बस जाते हैं। धरती और आस्माँ भी नाज़ुक हैं। खरबों साल बाद आग का गोला जो सूरज है, ठोस दिखता गैस का बवंडर ख़त्म हो जाएगा। आख़िर में कोई नहीं जीतता, न इंसान, न आस्माँ। फ़ौज-पुलिस तो कभी नहीं जीतती।सचमुच ठोस है वह जो हर किसी को नाज़ुक दिखता है—प्यार।
मैं फूल हूँधूप की तरफ़ मुड़ता हुआ
मिट्टी मिलती है मिट्टी मेंयही देखकर ख़ुश हैं लोग
बहुत बड़ा शहरबहुत बड़ा अँधेरा