प्रियतमा का सौंदर्य

लक्ष्मीनाथ बेजबरुआलक्ष्मीनाथ बेजबरुआ

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किसलिए चाहिए सिंदूरी गाल

प्रेमी पतंग की आग, अरे

‘कोवा भातुरीया’* छलना के अधरों के नीचे

नागिन रहती सोई।

किसलिए चाहिए तिरबिर झलमल आँखें

ज्यों स्वर्ग के तारे

चाहिए किसलिए वैसी उभरी छाती नवजीत कोमल

फिसले मदन के कदम जहाँ रे

क्या है ज़रूरत लंबे मेघ-वर्ण के

सागर लहरों जैसे बाल

प्रेम-बावले की हृदय तरणी

जिसमें डूब चली जाती पाताल

मृणाल करों से क्या होने वाला

जो मत्त प्रणयी के हिंडोले भर

पंचम मधुबोली होती व्याध की तुरही

कर रखती केवल विभोर

सुगोल, सुगठित सुवलित चारु

बाँहें जाँघें कर उरोज

हैं ये सभी पैने-पैने आयुध

सान चढ़े नुकीले वाण-प्रखर

नहीं चाहिए सुंदरी जो हर ले मन-प्राण

दे दो मुझे ऐसा हृदय

जिस हृदय में डूब मेरे ये प्राण

खो जाएँ, हो निर्भय,

दो ऐसा प्रेम जो प्रेम

कर देता अलग अस्तित्व विलोप

प्रणय-मदिरा देना मुझे ऐसा

चिरंतन नशा हो कभी न लोप

चाहिए ऐसा चुंबन शुद्ध हृदयों को जो दे जोड़

आँखें ऐसी जो हों खुले द्वार

प्रेम का उन्मुक्त भंडार

बात नहीं है प्रेम, प्रेम है मुरली की पुकार

कपट जिसमें होता नहीं कोई,

प्रेम-प्रेम में प्रेम की डोरी

बंधन कहते, उसे बेकार

मत देना, मत देना ऐसी सुंदर प्रतिमा

जो हो केवल सौंदर्य की खान

गुलाबी हँसी रहे अधरों पर

पर अंतर में काल नागिन प्रमाण।

कोमल अंतर, प्रेममय मन

कोमल शीतल हृदय

जितना चाहो दे दो, प्यारे दिन-रात रहे मन

अचल, अटल, निर्भय।

1. छलना बाहर रंग-रंगीला अंदर से निस्सार

लक्ष्मीनाथ बेजबरुआ
About the poet

लक्ष्मीनाथ बेजबरुआ

‘साहित्यर्थी’ और ‘रसराज’ के रूप में सुप्रसिद्ध असमिया कवि-लेखक-व्यंग्यकार।

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