प्रेम

लक्ष्मीनाथ बेजबरुआलक्ष्मीनाथ बेजबरुआ

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ब्रह्मांड का सच झर रहा निरंतर

गिर-वन, वृक्ष-लता सबको सचेतन कर

फूलों में खिलाता अमृत-हास रंग

बहती मंदाकिनी जिस शक्ति-प्रभाव संग

अणु-परमाणु मिलते आकर्षित अंतर

भिन्न-भिन्न आत्माएँ हो जातीं एकाकर मिलकर।

हट जाता व्यवधान दूर पास जाता

अव्यक्त होता व्यक्त, अपने पराए का अंतर मिट जाता

सर्वांग में होता सर्वांग विलय, जीवन में जीवन

आंनद में मिलता आंनद, महानंद का सर्जन

परिभाषा से परे शक्ति, विश्वव्यापी काया

क्षणिक-संभोग से जिसके देवत्व की मिलती छाया।

मरुप्लावित होता, शिला पिघलती बिंदु का स्पर्श पाकर

प्रेम कहते जिस महाशक्ति को, करती प्रकाशित विश्व निरंतर।

लक्ष्मीनाथ बेजबरुआ
About the poet

लक्ष्मीनाथ बेजबरुआ

‘साहित्यर्थी’ और ‘रसराज’ के रूप में सुप्रसिद्ध असमिया कवि-लेखक-व्यंग्यकार।

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