एक
प्रश्न : जन्म से ही सुनता आया हूँ
मोतियों की मालाओं के बारे में
कहाँ मिलती वह? कैसी है वह चीज़?
देखा तो नहीं उसे कभी भी!
उत्तर : ‘प्रिये, सुनती जाओ’ कहकर मैंने दी आवाज़
मुस्कान बिखेर कर
उस मुस्कान ने खिला दी हँसी
जगमग उभरे दाँत
उँगली दिखा, कहा—
वहीं देख लो, अहा।
दो
प्रश्न : और सुना है, है लाल गुलाब की मणि कोई
पर देखा तो कभी नहीं
उत्तर : फिर दिखलाया प्रियतमा के अधर
जैसे, लाल प्रवाल-मणि
प्रश्न : सुना है कि बिन काँटे का अपरूप गुलाब
दुनिया में नहीं कोई
उत्तर : कुछ कहे बग़ैर प्रिया के गालों पर
टिकी आँखें, कहतीं, क्या कहेगा कोई?
प्रश्न : कहाँ है ऐसा अपूर्व कमल
जो खिला रहता दिन-रात?
उत्तर : आँखों के इशारे से दिखाया प्रिया को
मुँहह से बिन कहे कोई बात
प्रश्न : प्रेम का पुतला प्यार की प्रतिमा
कोई बनाता मूर्तिकार?
उत्तर : चाहे जो भी बनाए, पर वह प्रतिमा
यह देखो, मेरे घर को किए उजियार।








