प्रियतमा

लक्ष्मीनाथ बेजबरुआलक्ष्मीनाथ बेजबरुआ

1 min read · 12.4K reads

एक

प्रश्न   : जन्म से ही सुनता आया हूँ
         मोतियों की मालाओं के बारे में
         कहाँ मिलती वह? कैसी है वह चीज़?
         देखा तो नहीं उसे कभी भी!
उत्तर : ‘प्रिये, सुनती जाओ’ कहकर मैंने दी आवाज़ 
         मुस्कान बिखेर कर 
         उस मुस्कान ने खिला दी हँसी 
         जगमग उभरे दाँत 
         उँगली दिखा, कहा—
         वहीं देख लो, अहा।

दो

प्रश्न   : और सुना है, है लाल गुलाब की मणि कोई
         पर देखा तो कभी नहीं
उत्तर : फिर दिखलाया प्रियतमा के अधर 
         जैसे, लाल प्रवाल-मणि
प्रश्न   : सुना है कि बिन काँटे का अपरूप गुलाब
         दुनिया में नहीं कोई
उत्तर : कुछ कहे बग़ैर प्रिया के गालों पर
         टिकी आँखें, कहतीं, क्या कहेगा कोई?
प्रश्न   : कहाँ है ऐसा अपूर्व कमल
         जो खिला रहता दिन-रात? 
उत्तर : आँखों के इशारे से दिखाया प्रिया को 
         मुँहह से बिन कहे कोई बात
प्रश्न   : प्रेम का पुतला प्यार की प्रतिमा
         कोई बनाता मूर्तिकार? 
उत्तर : चाहे जो भी बनाए, पर वह प्रतिमा 
         यह देखो, मेरे घर को किए उजियार।

 
लक्ष्मीनाथ बेजबरुआ
About the poet

लक्ष्मीनाथ बेजबरुआ

‘साहित्यर्थी’ और ‘रसराज’ के रूप में सुप्रसिद्ध असमिया कवि-लेखक-व्यंग्यकार।

View profile & all 13 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like