About ख़ंजर अजमेरी
उपनाम : 'शैख़ मोहम्मद अब्दुल्लाह' मूल नाम : shaiKH mohammad abdullaah जन्म : अजमेर, राजस्थान
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Poetry & Stories
ज़ुल्फ़ सुलझाई उन की शाने से
ज़ुल्फ़ सुलझाई उन की शाने सेमुझ से बिगड़े इसी बहाने से
दिया है दिल तुम्हें अपना समझ कर
दिया है दिल तुम्हें अपना समझ करअमानत है इसे रखना समझ कर
किसी दिन घर मिरे आया तो होता
किसी दिन घर मिरे आया तो होतातलत्तुफ़ मुझ पे फ़रमाया तो होता
बुलबुल के सर में क्यों न भरे फिर हवा-ए-गुल
बुलबुल के सर में क्यों न भरे फिर हवा-ए-गुलगुल बुलबुलों पे शेफ़्ता बुलबुल फ़िदा-ए-गुल
ख़ून-ए-दिल है शराब के मानिंद
ख़ून-ए-दिल है शराब के मानिंदऔर जिगर है कबाब के मानिंद
About ख़ंजर अजमेरी
उपनाम : 'शैख़ मोहम्मद अब्दुल्लाह'
मूल नाम : shaiKH mohammad abdullaah
जन्म :अजमेर, राजस्थान
ख़ंजर अजमेरी: Quick Answers
Who is ख़ंजर अजमेरी?
उपनाम : 'शैख़ मोहम्मद अब्दुल्लाह' मूल नाम : shaiKH mohammad abdullaah जन्म : अजमेर, राजस्थान
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Poems & Stories by ख़ंजर अजमेरी
ज़ुल्फ़ सुलझाई उन की शाने से
ज़ुल्फ़ सुलझाई उन की शाने सेमुझ से बिगड़े इसी बहाने से
दिया है दिल तुम्हें अपना समझ कर
दिया है दिल तुम्हें अपना समझ करअमानत है इसे रखना समझ कर
किसी दिन घर मिरे आया तो होता
किसी दिन घर मिरे आया तो होतातलत्तुफ़ मुझ पे फ़रमाया तो होता
बुलबुल के सर में क्यों न भरे फिर हवा-ए-गुल
बुलबुल के सर में क्यों न भरे फिर हवा-ए-गुलगुल बुलबुलों पे शेफ़्ता बुलबुल फ़िदा-ए-गुल
ख़ून-ए-दिल है शराब के मानिंद
ख़ून-ए-दिल है शराब के मानिंदऔर जिगर है कबाब के मानिंद
जिस वक़्त से ख़फ़ा वो मिरा यार हो गया
जिस वक़्त से ख़फ़ा वो मिरा यार हो गयाकरना सहर भी शाम को दुश्वार हो गया
इस तरह गेसू-ए-शब-गूँ हैं रुख़-ए-जानाँ के पास
इस तरह गेसू-ए-शब-गूँ हैं रुख़-ए-जानाँ के पासजैसे छाई हो घटा काली मह-ए-ताबाँ के पास
उस को तन्हा जिस घड़ी पाते हैं हम
उस को तन्हा जिस घड़ी पाते हैं हममुज़्तरिब हो कर पलट जाते हैं हम
जो सूरत देख ली उस मह-लक़ा की
जो सूरत देख ली उस मह-लक़ा कीनज़र आई मुझे क़ुदरत ख़ुदा की
किए जाता जो वो जौर-ओ-जफ़ा है
किए जाता जो वो जौर-ओ-जफ़ा हैजफ़ा की भी कुछ आख़िर इंतिहा है
मैं न इक साअ'त रहा आराम में
मैं न इक साअ'त रहा आराम मेंगर क़फ़स से छूट आया दाम में
कुछ एक मैं ही नहीं तेरा जान-ए-जाँ मुश्ताक़
कुछ एक मैं ही नहीं तेरा जान-ए-जाँ मुश्ताक़है तेरी दीद का मुद्दत से इक जहाँ मुश्ताक़
Selected Quotes by ख़ंजर अजमेरी (चुनिंदा उद्धरण)
ज़ुल्फ़ सुलझाई उन की शाने सेमुझ से बिगड़े इसी बहाने सेदिया है दिल तुम्हें अपना समझ करअमानत है इसे रखना समझ करख़ून-ए-दिल है शराब के मानिंदऔर जिगर है कबाब के मानिंदकिसी दिन घर मिरे आया तो होतातलत्तुफ़ मुझ पे फ़रमाया तो होताबुलबुल के सर में क्यों न भरे फिर हवा-ए-गुलगुल बुलबुलों पे शेफ़्ता बुलबुल फ़िदा-ए-गुलकुछ एक मैं ही नहीं तेरा जान-ए-जाँ मुश्ताक़है तेरी दीद का मुद्दत से इक जहाँ मुश्ताक़Videos on ख़ंजर अजमेरी
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