अनाज का बीज सँभालकर रखे हैं मैंने
जाड़ा बीत जाए, चैत की धूप जला दे कीटाणु
मुक्त करे दुषित मिट्टी
क्या पानी आने दो, फिर अनाज का बीच छींट दूँगा
मन-मिट्टी मेरी रोमांचित युवा
पलकों में वह आई हैं दो नदियाँ
मटमैले पानी के टलमल सोते के दाएँ-बाएँ गसे हुए धान
जीवन-जटिल-ग्रंथि में मेरा भरा-पूरा
पसीना भरा तरोताज़ा सपना।








