किसान और आत्महत्या

हरीशचंद्र पांडेहरीशचंद्र पांडे28 Sept 1952

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उन्हें धर्मगुरुओं ने बताया था प्रवचनों में

आत्महत्या करने वाला सीधे नर्क जाता है

तब भी उन्होंने आत्महत्या की

क्या नर्क से भी बदतर हो गई थी उनकी खेती

वे क्यों करते आत्महत्या

जीवन उनके लिए उसी तरह काम्य था

जिस तरह मुमुक्षओं के लिए मोक्ष

लोकाचार उनमें सदानीरा नदियों की तरह प्रवहमान थे

उन्हीं की हलों के फाल से

संस्कृति की लकीरें खिंची चली आई थीं

उनका आत्म तो कपास की तरह उज्जर था

वे क्यों करते आत्महत्या

वे तो आत्मा को ही शरीर पर वसन की तरह बरतते थे

वे जड़ें थे फुनगियाँ नहीं

अन्नदाता थे बिचौलिए नहीं

उनके नंगे पैरों के तलुवों को

धरती अपनी संरक्षित ऊर्जा से थपथपाती थी

उनके खेतों के नाक-नक़्श उनके बच्चों की तरह थे

वे क्यों करते आत्महत्या

जो पितरों के ऋण तारने के लिए

भाषा-भूगोल के प्रायद्वीप नाप डालते हैं

अपने ही ऋणों के दलदल में धँस गए

जो आरुणि की तरह शरीर को ही मेड़ बना लेते थे

मिट्टी में जीवन-द्रव्य बचाने

स्वयं खेत हो गए

कितना आसान है हत्या को आत्महत्या कहना

और दुर्नीति को नीति

हरीशचंद्र पांडे
About the poet

हरीशचंद्र पांडे

नवें दशक में सामने आए हिंदी के महत्त्वपूर्ण कवि। अपने काव्य-विषयों, धैर्य और सादगी के लिए उल्लेखनीय मूल नाम : हरीशचंद्र पांडे जन्म : अल्मोड़ा, उत्तराखंड हरीशचंद्र पांडे का जन्म उत्तराखंड से अल्मोड़ा में 28 दिसंबर 1952 को हुआ। अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ से स्कूली शिक…

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