पानी

हरीशचंद्र पांडेहरीशचंद्र पांडे28 Sept 1952

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देह अपना समय लेती ही है

निपटाने वाले चाहे जितनी जल्दी में हों

भीतर का पानी लड़ रहा है बाहरी आग से

घी-जौ चंदन आदि साथ दे रहे हैं आग का

पानी देह का साथ दे रहा है

यह वही पानी था जो अँजुरी में रखते ही

ख़ुद-ब-ख़ुद छिर जाता था बूँद-बूँद

यह देह की दीर्घ संगत का आंतरिक सखा भाव था

जो देर तक लड़ रहा था देह के पक्ष में

बाहर नदियाँ हैं भीतर लहू है

लेकिन केवल ढलान की तरफ़ भागता हुआ नहीं

बाहर समुद्र है नमकीन

भीतर आँखें हैं

जहाँ गिरती नहीं नदियाँ, जहाँ से निकलती हैं

अलग-अलग रूपाकारों में दौड़ रहा है पानी

बाहर लाल-लाल सेब झूम रहे हैं बग़ीचों में

गुलाब खिले हुए हैं

कोपलों की खेपें फूटी हुई हैं

वसंत दिख रहा है पूरमपूर

जो नहीं दिख रहा इन सबके पीछे का

जड़ से शिराओं तक फैला हुआ है भीतर ही भीतर

उसी में बह रहे हैं रुप, स्वाद, आकार

उसके न होने का मतलब ही

पतझड़ है

रेगिस्तान है

उसी को सबसे किफ़ायती ढंग से बरतने का नाम हो सकता है

वुज़ू

हरीशचंद्र पांडे
About the poet

हरीशचंद्र पांडे

नवें दशक में सामने आए हिंदी के महत्त्वपूर्ण कवि। अपने काव्य-विषयों, धैर्य और सादगी के लिए उल्लेखनीय मूल नाम : हरीशचंद्र पांडे जन्म : अल्मोड़ा, उत्तराखंड हरीशचंद्र पांडे का जन्म उत्तराखंड से अल्मोड़ा में 28 दिसंबर 1952 को हुआ। अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ से स्कूली शिक…

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