शायद हम एक ऐसी दुनिया से विदा लेंगे जहाँ,
क़ातिल ख़ुद से ही बरी कर लेता है ख़ुद को।
जज ख़ुद को ही बर्ख़ास्त कर लेता है।
धमाके ख़ुद ही हो जाते हैं और लोग उनमें ख़ुद ही मर जाते हैं।
लड़कियाँ ख़ुद ही बलात्कार कर लेती हैं।
जाँच ख़ुद ही बदल जाया करती हैं।
फाँसी का फंदा ख़ुद ही बन जाता है।
किसानों और लड़कियों में ख़ुद ही होड़ मच जाती है
कि मरने में किसकी संख्या ज़्यादा होगी।
पैसे ख़ुद ही लुट जाते हैं। देश ख़ुद ही बर्बाद हो जाता है।
दलित ख़ुद ही अछूत हो जाते हैं।
बुरका ख़ुद ही पड़ जाता है औरतों की अक़्ल पे।
किसी ने नहीं मारा नरेंद्र दाभोलकर को, गोविंद पानसारे को,
एम.एम. कलबुर्गी को, गौरी लंकेश को।
सत्य की बात करने वालों ने जंभाई लेते हुए एक दिन सोचा
कि अब मर जाते हैं और मर गए।
कोई भी ज़िंदा नागरिक ख़ुद कुछ नहीं कर रहा हमारे देश में।
नदी की सतह पर ख़ुद-ब-ख़ुद तैर रही हैं देश के सपनों की लाशें।








