आओ मिट्टी-मिट्टी खेलें

हुकुम ठाकुरहुकुम ठाकुर

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हमें आँतों से सोचना होता है

सुबह और शाम की पालियों में कटता दिन

एक के ऊपर तह लगती आवाज़ें

जब धरती पर गिरते हैं तो कंकाल कहलाते हैं

अब धान के पूलों के छट्टाके से धान कम गिरता है

सुग्गे और मक्की के भुट्टे की मिलनी बदस्तूर जारी है

मौसम के टुकड़ों की उँगली पकड़कर यहाँ तक आए प्रवासी पक्षी

टुकड़ों के रीतते ही लौट गए

उनके पंजों के नाप से

जिन खेतों के रकबे नापे गए

वहाँ दानों के सफ़र में

तीतरों की अपीलें ख़ारिज हो चुकी हैं

तल्ख़ होने के लिए

केवल नीलकंठी की फाँकी ज़रूरी नहीं

हम भविष्य की आँख में आँख डाल देखना चाहते हैं

क्योंकि आँखें गूँगी नहीं होतीं

हाथ बहरे नहीं होते

इतिहास कहीं भी लिखा जा सकता है—

गंदी दीवारों पर

महाजनी-ऋण की क़िश्तों के कटआउट पर

अपमान और घृणा की उँगलियों की छाप लगे प्यालों पर

बेलिहाज़ी के पत्थरों की कठोरता पर

हम खेतों को खुरचते हैं खेत हमको

हम उनके भीतर स्थापित होने की कला सीख रहे हैं

वे हमको जगह देकर

जीवन से पलायन के दाम से छुटकारा देने में लगे हैं

इसलिए साथी!

आओ हम मिट्टी-मिट्टी खेलें।

हुकुम ठाकुर
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हुकुम ठाकुर

हुकुम ठाकुर

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