हिजड़े

हरीशचंद्र पांडेहरीशचंद्र पांडे28 Sept 1952

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ये अभी-अभी एक घर से बाहर निकले हैं

टूट गए रंगीन गुच्छे की तरह

काजल-लिपिस्टिक और सस्ती ख़ुशबुओं का एक सोता फूट पड़ा है

एक औरत होने के लिए

कपड़े की छातियाँ उभारे

ये औरतों की तरह चलने लगे हैं

और औरत नहीं हो पा रहे हैं

ये मर्द होने के लिए गालियाँ दे रहे हैं

औरतों से चुहल कर रहे हैं अपने सारे पुंसत्व के साथ

और मर्द नहीं हो पा रहे हैं

मर्द और औरतें इन पर हँस रहे हैं

सारी नदियों का रुख़ मोड़ दिया जाए इनकी ओर

तो भी ये फ़सल न हो सकेंगे

ऋतु वसंत का ताज पहना दिया जाए इन्हें

तो भी एक अंकुवा नहीं फूटेगा इनके

इनके लिए तो होनी थी ये दुनिया

एक महा सिफ़र

लेकिन

लेकिन ये हैं कि

अपने व्यक्तित्व के सारे बेसुरेपन के साथ गा रहे हैं

जीवन में अंकुआने के गीत

ये अपने एकांत के लिए किलारियों की अनुगूँजें इकट्ठा कर रहे हैं

विद्रूप हारमोनों और उदास वल्दियत के साथ

ये दुनिया के हर मेले में शामिल हो रहे हैं समूहों में

नहीं सुनने मे आ रहीं आत्महत्याएँ हिजड़ों की

दंगों में शामिल होने के समाचार नहीं आ रहे

मर्द और औरतों से अटी पड़ी इस दुनिया में

इनका पखेरुओं की तरह चुपचाप विदा हो जाना

कोई नहीं जानता

हरीशचंद्र पांडे
About the poet

हरीशचंद्र पांडे

नवें दशक में सामने आए हिंदी के महत्त्वपूर्ण कवि। अपने काव्य-विषयों, धैर्य और सादगी के लिए उल्लेखनीय मूल नाम : हरीशचंद्र पांडे जन्म : अल्मोड़ा, उत्तराखंड हरीशचंद्र पांडे का जन्म उत्तराखंड से अल्मोड़ा में 28 दिसंबर 1952 को हुआ। अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ से स्कूली शिक…

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