नज़्र-ए-इक़बाल - नज़्म

फ़ीरोज़ा यासमीनफ़ीरोज़ा यासमीन

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वो इक मुफ़क्किर-ए-अज़ीम शाइ'र

था वो इक़बाल शाइ'रों का

वो ज़िंदगानी का राज़-दाँ

वो कामरानी का नग़्मा-ख़्वाँ

मक़्बूल था हिंद-ओ-पाक में वो यकसाँ

तराना-ए-हिन्द का वो ख़ालिक़

वो फ़लसफ़ी था वो रहनुमा था

दिया फ़ल्सफ़ा जिस ने ख़ुदी-ओ-बे-ख़ुदी का

तमाम दुनिया के नज़्म-हा-ए-सियासत

तमाम दुनिया के नुक़्ता-हा-ए-नज़र

थे उस की चश्म-ए-बीना में रौशन

था मगर वो आशिक़-ए-एशिया

हरीफ़ था अहल-ए-मग़रिब का वो

ख़िताब जिस को दिया था क़ौम ने उस की

वही था शाइर-ए-मशरिक़

था वो मुबल्लिग़ इस्लाम का बे-शक

कि इस्लाम है अम्न-ओ-राहत का मज़हब

वो था इक मर्द-ए-कामिल इंसाँ मुकम्मल

गरचे था बरहमन-ज़ादा कश्मीर का

नज़र में उस की था देवता सा

वतन की मिट्टी का हर एक ज़र्रा

ख़िरद थी उस की निगाह में हेच-ओ-पस्त

जुनून-ए-इश्क़ का था वो दिल से क़ाइल

वो था इक पैग़म्बर इल्म-ओ-अमल का

थी न महदूद शायरी उस की

न था महदूद दायरा उस के पैग़ाम का

थे मुख़ातब उस के सारी दुनिया के आम-ओ-ख़ास

किसानों मज़दूरों का था वो हामी

कह गया वो अपने शे'र में

जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर न हो रोज़ी

उस खेत के हर ख़ोशा-ए-गंदुम को जला दो

फ़ीरोज़ा यासमीन
About the poet

फ़ीरोज़ा यासमीन

जन्म : भोपाल, मध्य प्रदेश

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