लब पे हर वक़्त ये गिला क्या है

फ़ीरोज़ा यासमीनफ़ीरोज़ा यासमीन

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लब पे हर वक़्त ये गिला क्या है

ऐसे जीने में फिर मज़ा क्या है

सब मोहब्बत में हार बैठे हैं

दिल के जज़्बात में रखा क्या है

शम-ए-उमीद हैं जलाए हुए

हम नहीं जानते वफ़ा क्या है

जिस ने हम को दिया है ज़ख़्म-ए-दिल

पूछते हैं वही हुआ क्या है

जानते हो जो 'यासमीं' की ग़रज़

फिर न पूछो कि मुद्दआ' क्या है

फ़ीरोज़ा यासमीन
About the poet

फ़ीरोज़ा यासमीन

जन्म : भोपाल, मध्य प्रदेश

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