लब पे हर वक़्त ये गिला क्या है
ऐसे जीने में फिर मज़ा क्या है
सब मोहब्बत में हार बैठे हैं
दिल के जज़्बात में रखा क्या है
शम-ए-उमीद हैं जलाए हुए
हम नहीं जानते वफ़ा क्या है
जिस ने हम को दिया है ज़ख़्म-ए-दिल
पूछते हैं वही हुआ क्या है
जानते हो जो 'यासमीं' की ग़रज़
फिर न पूछो कि मुद्दआ' क्या है








