बारिश कहीं नहीं थी
बारिश में भींगता कौआ था
कौआ कहीं नहीं था
कौए की चोंच में रोटी का टुकड़ा था
रोटी कहीं नहीं थी
खेत में लहलहाती गेंहू की बालियाँ थी
खेत कहीं नहीं था
किसानों के माथे पे कृषि ऋण का कलंक था
सरकार कहीं नहीं थी
सरकार के रूप में कुछ साहूकार थे
और संसद में जूट की खेती थे
और किसानों के गले पर रस्सी की गाँठ थी
भीड़ थी, नारे थे
नारों में जय जवान जय किसान था
सरहद पर ज़ैतून के
ज़र्द पत्तों की आँधी की शक्ल में
कुछ सैनिक थे
कुछ क़दम अपने भीतर खिसक कर
बच्चों के लिए खिलौने ख़रीदते हुए
प्रजातंत्र के जूते के नीचे मूर्च्छित जय किसान था
नदियों के होठों पर त्राहिमाम-त्राहिमाम
राष्ट्र है या कुश्ती का यह अखाड़ा कोई
जो बिहार में लंगोट
मुंबई में वही छप्पन इंच
मीडिया में जाँघ पर ताल
और शासन-काल बकरी की पीठ से फिसलकर
धूल फाँक रहा पहलवान था
राष्ट्र कहीं नहीं था
सिर्फ़ राष्ट्रभक्ति थी
और और और राष्ट्रभक्ति थी
राष्ट्र के गले में टाई बाँधने में मशग़ूल
झूला झूल रही राष्ट्रभक्ति
हमारा राष्ट्र टाई पहनकर इम्तिहान देने जाएगा
इम्तिहान में शायरी पढ़कर ज़ीरो नंबर लाएगा
विद्वता भैंस की पीठ में बैठ जुगाली कर रही थी
कोई दूध दूहने में पी-एच.डी. था
कोई लाठी भाँजने में एम.बी.बी.एस.
बचे-खुचे मुट्ठी भर पढ़े-लिखे लोग
घास छिलने में व्यस्त थे
जो जितना बड़ा मूर्ख वह उतना बड़ा विद्वान था
और मानचित्र पर प्रगतिशील हिंदुस्तान था।








