About सरवत ज़ेहरा
मूल नाम : सरवत ज़ेहरा जन्म : 05 May 1972 | कराची, सिंध
Selected Quotes
Poetry & Stories
सवाब की दुआओं ने गुनाह कर दिया मुझे
सवाब की दुआओं ने गुनाह कर दिया मुझेबड़ी अदा से वक़्त ने तबाह कर दिया मुझे
ख़ाली ख़ाली रस्तों पे बे-कराँ उदासी है
ख़ाली ख़ाली रस्तों पे बे-कराँ उदासी हैजिस्म के तमाशे में रूह प्यासी प्यासी है
क़तरा क़तरा बिखर रहा है कोई
क़तरा क़तरा बिखर रहा है कोईबस करो हिज्र मर रहा है कोई
फिर आस दे के आज को कल कर दिया गया
फिर आस दे के आज को कल कर दिया गयाहोंटों के बीच बात को शल कर दिया गया
हर एक ख़्वाब सो गया ख़याल जागते रहे
हर एक ख़्वाब सो गया ख़याल जागते रहेजवाब पी लिए मगर सवाल जागते रहे
About सरवत ज़ेहरा
मूल नाम : सरवत ज़ेहरा
जन्म : 05 May 1972 | कराची, सिंध
सरवत ज़ेहरा: Quick Answers
Who is सरवत ज़ेहरा?
मूल नाम : सरवत ज़ेहरा जन्म : 05 May 1972 | कराची, सिंध
When was सरवत ज़ेहरा born?
सरवत ज़ेहरा was born on 5 May 1972. Associated place: वर्जीनिया, संयुक्त राज्य अमेरिका.
Where can I read सरवत ज़ेहरा's poetry?
Kavishala has 45 poems and stories and 13 couplets (sher) by सरवत ज़ेहरा, free to read on this page, along with selected quotes you can share.
Poems & Stories by सरवत ज़ेहरा
सवाब की दुआओं ने गुनाह कर दिया मुझे
सवाब की दुआओं ने गुनाह कर दिया मुझेबड़ी अदा से वक़्त ने तबाह कर दिया मुझे
ख़ाली ख़ाली रस्तों पे बे-कराँ उदासी है
ख़ाली ख़ाली रस्तों पे बे-कराँ उदासी हैजिस्म के तमाशे में रूह प्यासी प्यासी है
क़तरा क़तरा बिखर रहा है कोई
क़तरा क़तरा बिखर रहा है कोईबस करो हिज्र मर रहा है कोई
फिर आस दे के आज को कल कर दिया गया
फिर आस दे के आज को कल कर दिया गयाहोंटों के बीच बात को शल कर दिया गया
हर एक ख़्वाब सो गया ख़याल जागते रहे
हर एक ख़्वाब सो गया ख़याल जागते रहेजवाब पी लिए मगर सवाल जागते रहे
बे-तहाशा उसे सोचा जाए
बे-तहाशा उसे सोचा जाएज़ख़्म को और कुरेदा जाए
वक़्त भी अब मिरा मरहम नहीं होने पाता
वक़्त भी अब मिरा मरहम नहीं होने पातादर्द कैसा है जो मद्धम नहीं होने पाता
एक चुप खाए गई है मुझ को
एक चुप खाए गई है मुझ कोआगही ढाए गई है मुझ को
खूटियों पर ख़ामुशी लटकाई है
खूटियों पर ख़ामुशी लटकाई हैअलगनी पर सूखती तन्हाई है
सवाल-अंदर-सवाल ले कर कहाँ चले हो
सवाल-अंदर-सवाल ले कर कहाँ चले होये आसमान-ए-मलाल ले कर कहाँ चले हो
तुम्हारी मुंतज़िर यूँ तो हज़ारों घर बनाती हूँ
तुम्हारी मुंतज़िर यूँ तो हज़ारों घर बनाती हूँवो रस्ता बनते जाते हैं कुछ इतने दर बनाती हूँ
हज़ार टूटे हुए ज़ावियों में बैठी हूँ
हज़ार टूटे हुए ज़ावियों में बैठी हूँख़याल ओ ख़्वाब की परछाइयों में बैठी हूँ
Selected Quotes by सरवत ज़ेहरा (चुनिंदा उद्धरण)
बिंत-ए-हव्वा हूँ मैं ये मिरा जुर्म है और फिर शाएरी तो कड़ा जुर्म हैख़्वाब और तमन्ना का क्या हिसाब रखना है ख़्वाहिशें हैं सदियों की उम्र तो ज़रा सी हैजाने वाले को चले जाना है फिर भी रस्मन ही पुकारा जाएवक़्त भी अब मिरा मरहम नहीं होने पाता दर्द कैसा है जो मद्धम नहीं होने पाताजो सारा दिन मिरे ख़्वाबों को रेज़ा रेज़ा करते हैं मैं उन लम्हों को सी कर रात का बिस्तर बनाती हूँदिल के दरिया ने किनारों से मोहब्बत कर ली तेज़ बहता है मगर कम नहीं होने पाताCouplets (Sher) by सरवत ज़ेहरा
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