नन्हा शिशु

एम. पी. अप्पनएम. पी. अप्पन

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स्मिताभा से विलसित

नन्हा बच्चा! तेरे कोमल मुख पर

वाह, कैसा अद्भुत तेज़—

परितृप्ति, प्रशांति और आनंद का!

नहीं मिलता यह आलोक

आकाश के तारों में,

फूल औ’ रत्न में,

जो तुझमें दीप्त है।

तेरा यह मृदुल श्रीसम्पन्न कलेवर

किस धातु से बनाया विश्व-शिल्पी ने?

तेरे नयन, इस मोहन जगत को

स्नेह-स्निग्ध देखते हैं।

मिट्टी, बाँसुरी, मिट्टी के पुतले

और फूल तेरे मित्र तो हैं।

काश, तेरी अमलता की कांति

लड़ते-झगड़ते मानवों पर पड़ी होती!

एम. पी. अप्पन
About the poet

एम. पी. अप्पन

‘महाकवि’ के रूप में सुप्रतिष्ठित मलयाली कवि।

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