घाव

हरि मृदुलहरि मृदुल

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लंबे समय से बिस्तर पर हूँ

घाव भरने का नाम ही नहीं ले रहा है

मैं किसी बियाबान में नहीं

एक बिल्डिंग में रहता हूँ

फिर भी मेरे चारों ओर

मक्खियाँ ही भिनभिना रही हैं

कोई मिलने नहीं आता

मैं याद कर रहा हूँ उन मित्रों को

जिनसे मिलने के लिए मैं कितनी ही लंबी दूरी

तय करता रहा हूँ

वे रिश्तेदार मेरे ज़ेहन में हैं

जिनके लिए हमेशा ही मेरे घर के दरवाज़े

खुले रहे

उन सहकर्मियों को मैं भूला नहीं हूँ

जिनके सुख-दुख में मैंने सदा ही भागीदारी की

नहीं, दुखी नहीं हूँ रत्ती भर भी

बदले की भी कोई भावना नहीं मेरे मन में

मैं विस्मित हूँ

बस, जगत की इस रीत पर हँसता हूँ

ख़ैर, अब मुझे कीड़े-मकोड़ों से

दोस्ती की दरकार है

फ़िलहाल तो मैं किसी मक्खी पर सवार होकर

मोहल्ले भर का चक्कर लगाना चाहता हूँ

हरि मृदुल
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हरि मृदुल

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