अफ़वाहों के प्रवक्ता

फ़रीद ख़ाँफ़रीद ख़ाँ

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एक अच्छे अमानवीय शासन में ही स्थापित की जा सकती हैं,

अफ़वाहों की ऊँची-ऊँची प्रतिमाएँ, जो घृणा के बिना संभव नहीं है।

ख़ून-पसीना एक करना होता है, त्याग करना होता है।

झोला लेकर नगरी-नगरी द्वारे द्वारे घूमना होता है।

घृणा से प्रेम का परिवेश निर्माण करना होता है।

अफ़वाहों की स्थापना के लिए

एक कर्तव्यपरायण घृणित समाज का निर्माण करना होता है।

मित्रों के रूप में आते हैं अफ़वाहों के प्रवक्ता।

शिक्षक के रूप में भी आते हैं।

मुहल्ले के बुज़ुर्ग के रूप में भी आते हैं।

सभी हितैषी समझाते हैं लाभ और हानि अफ़वाहों के।

टी.वी. में भी दिखाई जाती हैं अफ़वाहें,

लेकिन ठीक उसके पहले घृणा का एक स्लॉट होता है।

मास मीडिया के ऊर्जावान नौजवान बड़ी मशक्कत से घृणा की ख़बरें लाते हैं।

फ़रीद ख़ाँ
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