बुद्धं शरणं गच्छामि

धीरेंद्र 'धवल'धीरेंद्र 'धवल'18 May 1990

1 min read · 12.4K reads

शरण में जाने का अर्थ इतना सीमित

चरणों में लोटना और पूजना

चमत्कारी करतब बताना, दिखाना, मानना

शरण का अर्थ इतना अराजक

इतना कि

जो शरण में न आए उसे मार डालना

विश्व विजेता की झोंक में

बुद्ध के मार्ग को तिलांजलि दे देना

स्वयं बुद्ध होते तो आश्चर्य में होते

जिन अंधविश्वासों और पाखंड के विरुद्ध

जिस हिंसा और छद्म के ख़िलाफ़

जिन दुखों से मुक्ति की खोज में

सत्य का संधान किया

जिन मूल्यों को स्थापित किया

वे सब ध्वस्त हो रहे हैं

बुद्ध जीवित होते

तो उन्हें बताया जाता

महाराज!

आपके बताए मार्ग पर चलने के बजाय

आपके अनुयायी आपके नाम पर

विशेष पूजा-पद्धति धारण कर चुके हैं

वैवाहिक समारोहों में

तमाम ढोंग-ढकोसले करते हैं

अनेक अराजक नियमों का बाड़ा बना चुके हैं

आपको अवतारी पुरुष बनाने के लिए

बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ गढ़ने का आदेश हुआ है

इस हेतु राजाज्ञा जारी हुई है

एक भव्य मंदिर का प्रस्ताव पारित हुआ है

राजा ऐलानिया बुद्ध-मार्गी हो चुका है

लेकिन बुद्ध मार्गी तौर-तरीक़े से राजतंत्र

उसे स्वीकार नहीं!!

धीरेंद्र 'धवल'
About the poet

धीरेंद्र 'धवल'

नई पीढ़ी के कवि। मूल नाम : धीरेंद्र 'धवल' जन्म : 18/05/1990 | मऊ, उत्तर प्रदेश

View profile & all 21 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like

ये दरवेशों की बस्ती है यहाँ ऐसा नहीं होगाये दरवेशों की बस्ती है यहाँ ऐसा नहीं होगालिबास-ए-ज़िंदगी फट जाएगा मैला नहीं होगा— मुनव्वर रानाचले मक़्तल की जानिब और छाती खोल दी हम नेचले मक़्तल की जानिब और छाती खोल दी हम नेबढ़ाने पर पतंग आए तो चर्ख़ी खोल दी हम ने— मुनव्वर रानाकुछ नहीं चाहने वाली लड़कीसोलह की यह लड़की दो-तीन साल पहले तकपेड़-पौधों पर रखती थी पाँव— ऐश्वर्य राजआंबेडकर“तुम्हारे दीन मुखों को देखकरकरुणा भरे स्वरों को सुनकर— बी. गोपाल रेड्डीमेरा और मेरी पृथ्वी का(लंबी कविता के कुछ अंश)वैसा ही हूँ, दुख मेरी गोद का बच्चा, बार-बार— हीरेन भट्टाचार्यतालाब-1मैं क्षिति तल परतुम्हारे सुख-दुख का— ब्रजरतन जोशी