मेरा और मेरी पृथ्वी का

हीरेन भट्टाचार्यहीरेन भट्टाचार्य

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(लंबी कविता के कुछ अंश)

वैसा ही हूँ, दुख मेरी गोद का बच्चा, बार-बार

दोनों हाथ से उठाता, जीभ पर दुखियारे घर का नमक,

क़ै में निकलता है माड़

ग़ुस्सा मुझे जल्दी नहीं आता

ज़िम्मेदार बाप की तरह जानता हूँ

कैसे ग़ुस्से को समेट कर रखा जाता है

और किसे कहते हैं क्षमा, बहुत ज़िम्मेदारी है मुझ पर

दुखों को पाल-पोसकर आदमी बनाने की भारी ज़िम्मेदारी,

एकांत में जर्जर बीमार तन,

कुछ कहने लगता हूँ तो कंठ से फूट पड़ता है अजाना ख़ून

मुँह के भीतर-बाहर।

हीरेन भट्टाचार्य
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हीरेन भट्टाचार्य

हीरेन भट्टाचार्य

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