तुम्हें सोचते हुए
रोज़
एक नई दुनिया रचती हूँ
मिट्टी के चावल
धूल की सब्ज़ी
पत्ते की रोटी
खेल-घर जैसी...
एक ऐसी दुनिया
जिसे कोई नहीं जानता
जहाँ
प्रकाश-लोभ से
स्वयं को जलाती हूँ मैं...
तुम्हें सोचते हुए
रोज़
एक नई दुनिया रचती हूँ
मिट्टी के चावल
धूल की सब्ज़ी
पत्ते की रोटी
खेल-घर जैसी...
एक ऐसी दुनिया
जिसे कोई नहीं जानता
जहाँ
प्रकाश-लोभ से
स्वयं को जलाती हूँ मैं...

नई पीढ़ी की सुपरिचित-सम्मानित बांग्ला कवि-गद्यकार-अनुवादक। बारह से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी में भी कविताएँ लिखती हैं।
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