समकालीन

बद्री नारायणबद्री नारायण5 Oct 1965

1 min read · 12.4K reads

समकालीन हूँ मैं आपका

अगर मैं गोष्ठी में बुलाऊँ

तो कभी आइएगा

कभी मत आइएगा

आ-आके आने से रह जाइएगा

कभी आते-आते रह जाइएगा

बिलम जाइएगा

पर आई.पी.एस. की बीवी के जन्मदिन पर

ज़रूर जाइएगा

उसका आटा पिसवाइएगा

उसका धान चलवाइएगा

उसकी साहित्यिक फ़सल की रोपनी में

गीत ज़रूर गाइएगा

किसी भी तरह पहुँच जाइएगा

भले ही गिरते-भहराते जाइएगा

आई.पी.एस. की बीवी न सही

तो बी.डी.ओ. की साली को ही साहित्यकार

बनवाने पहुँच जाइएगा

अगर किसी बॉम्बे के तस्कर के कविता-संकलन का विमोचन हो

तो उसमें तो ज़रूर जाइएगा

पर मेरी गोष्ठी में आने से कन्नी काट जाइएगा

लाल दरवाज़ा नहीं तो छोटा दरवाज़ा

बड़ा महल नहीं तो साहेब की

कोठी ही सही

शक्ति विकेंद्रित जनतंत्र ने बनाए हैं

सत्ता सुख पाने के अनेक छोटे-छोटे स्थान

इन स्थानों पर जा, हे मेरे समकालीन

सत्ता सुख पाइएगा

सीधे छुट्टी न मिले तो मेडिकल लेकर जाइएगा

जब कहीं भी ऐसा कुछ न हो रहा हो तो

मन मार

मेरी गोष्ठी में आ जाइएगा

और आकर मुझे लोकल कॉनवेयन्स्

के लिए हड़काइएगा

हो! मेरे समकालीन।

बद्री नारायण
About the poet

बद्री नारायण

सुपरिचित कवि-विचारक। साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित। मूल नाम : बद्री नारायण जन्म : 05/10/1965

View profile & all 39 Poems / Stories

More Poetry & Stories You May Like