शिल्पी

बेबी शॉबेबी शॉ

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धीरे-धीरे तुम छू लेते हो

मेरे नयन

मेरे कान

मेरे खुले बाल

पैरों में झूम उठता है आलता

झूम उठती है पायल

हरसिंगार दे देते हो हाथों में तुम

दोलनचम्पा मेरी कमर में खिल उठती है

तुम छू लेते हो मेरा पूरा शरीर

मैं काँप उठती हूँ

मैं ज़िंदा होने लगती हूँ

और तुम

चूम लेते हो

मंत्र

वाणी

मुग्धता

जग-जगत

इसे ही मान लेता है

पुण्यतिथि

पूजा!

बेबी शॉ
About the poet

बेबी शॉ

नई पीढ़ी की सुपरिचित-सम्मानित बांग्ला कवि-गद्यकार-अनुवादक। बारह से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी में भी कविताएँ लिखती हैं।

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